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सोने का लोटा ,नंगे बदन पर लंगोटा !

 सुना भगवानों के पास धन बहुत,

और अपने देश में निर्धन-बहुत !

मंदिरों में जमा है अकूत सोना ,
वहीँ द्वार पर भूखी भीड़,दो,ना !

 

लक्ष्मी,मंदिर में,चढ़ावा ,अथाह ,

पापी पेट की दिखी न कराह,आह !

आपके घर आभूषण,स्वर्ण-भण्डार,
हे ईश,इसी से करदो निर्धन -उद्धार !

    

स्वर्ण का मुकुट,रत्नों के ढेर,साईँ,

इन्हें नसीब नहीं रोटी की परछाईं !

अर्पित हुआ आपको सोने का लोटा,

देख लेते प्रभु,नंगे बदन पर लंगोटा !
                   _________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल

    (मौलिक ,अप्रकाशित रचना )

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on June 19, 2013 at 9:44am

सुन्दर रचना है प्रो साहब 
हार्दिक बधाई स्वीकारें 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 14, 2013 at 9:24pm

आ0 विशम्भर सर जी,  ’ सुना भगवानों के पास धन बहुत, और अपने देश में निर्धन.बहुत !’  बहुत ही सुन्दर रचना।  बधाई स्वीकारें।   सादर,

Comment by Sumit Naithani on June 14, 2013 at 1:07pm

sunder

Comment by vijayashree on June 14, 2013 at 12:18pm

लक्ष्मी,मंदिर में,चढ़ावा ,अथाह ,

पापी पेट की दिखी न कराह,आह !

आपके घर आभूषण,स्वर्ण-भण्डार,
हे ईश,इसी से करदो निर्धन -उद्धार

 

अति सुंदर प्रस्तुति

 

Comment by coontee mukerji on June 14, 2013 at 12:49am

आदरणीय शुक्ल जी , आपकी छोटी सी रचना ने बड़े बड़े प्रश्न खड़े कर दिये हैं....../सादर / कुंती .

Comment by ram shiromani pathak on June 13, 2013 at 1:28pm

वाह आदरणीय बहुत सुन्दर तरीके से व्यंग किया है अपने//हार्दिक बधाई

Comment by विजय मिश्र on June 13, 2013 at 11:48am
मार्मिक भी और भगवानों के पास पहुंचानेवाले अविवेकी धनवानों पर तंज भी , सुंदर . बधाई स्वीकार हो .
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 13, 2013 at 7:37am

कहीं पर्वत कही खाई!

प्रभु ने है बनाई !

प्रभु दीनबंधु कहलाते हैं.

दीन उनके ही गुण गाते हैं  

प्रभु, थोड़ी दया कीजिये 

दीनो का दुःख हरण कीजिये!

पर  जो वर्णन शुक्ल साहब ने किये है 

यह तो उनके भक्तों के करम हैं. सादर!

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