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आज बहुत पुरानी डायरी पर ...
उंगलियाँ चलाईं ...
जाने कहाँ से एक आवाज ..
चली आयी ..
आवाज, जानी पहचानी ...
कुछ बरसों पुरानी ..
एक हंसी,
जो दूर से हंसी जा रही थी..
कितनी बातें अचानक ..
उसी आवाज में चली आयी थी ..
उँगलियाँ बहुत तेजी से ..
डायरी को सहला रही थी ..
जैसे कुछ पकड़ना चाहती हो..
कुछ अहसास करना चाहती हो..
इन्ही अहसासों के साथ ..
कुछ सोचकर ..
डायरी मैंने  .. बंद कर दी
किसी और दिन के लिए ..
यादें सहेज कर .. बंद कर दी..

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 413

Comment

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Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 5:09pm

विजयश्री  जी आपके प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ...

Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 5:08pm

मान्यवर   coontee mukerji  जी बहुत बहुत आभार ... .आपका .. सादर

Comment by Amod Kumar Srivastava on June 26, 2013 at 5:08pm

मान्यवर  आबिद अली मंसूरी  जी बहुत बहुत आभार ... .आपका .. सादर

Comment by vijayashree on June 14, 2013 at 12:25pm

कुछ अहसास ऐसे होते हैं

जो हर पल साथ रहते है

 

खुबसूरत अहसास

Comment by coontee mukerji on June 14, 2013 at 12:51am

बहुत सुंदर ....../

Comment by Abid ali mansoori on June 12, 2013 at 6:53pm
एक मुकम्मल एहसास..जो आपकी रचना को पढ़कर हुआ सच मेँ..!
हार्दिक बधाई आदरणी महोदय!

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