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चाह बस् इतना कि




चाह नही मुझे कि..
मिलूँ तुमसे बागों व बहारों में

चाह नही मुझे कि..
मिलूँ तुमसे नदी के किनारों पे


चाह नही मुझे कि..
छेड़ो तुम  बंसी की तान और 
झूमती आऊँ मैं 


चाह नही कि..
बैठो तुम कदम्ब की डाल और
नाच के रिझाऊँ मैं 

चाह नही कि..
थामूं तुम्हारा हाथ और
निहारूँ तुम्हारी आँखों में


चाह बस इतनी कि..
हे नाथ !! 
छू लूँ तुम्हारे ‘पद पंकज’ और
हाथ हो तुम्हारा मेरे सिर पर ||


मौलिक / अप्रकाशित 

मीना पाठक 

Views: 876

Comment

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Comment by D P Mathur on June 18, 2013 at 7:54am

सर्वस्व सर्मपण का रूप लिए सुन्दर रचना ।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 17, 2013 at 9:58pm
आदरणीया..मीना जी,...आपके द्वारा बहुत ही सुंदर सरल सहज शब्दों में रचना की प्रस्तुति...हार्दिक शुभकामनाऐं
Comment by coontee mukerji on June 17, 2013 at 8:21pm

 श्रृंगार और भक्ति रस का बहुत सुंदर वर्णन . सादर / कुंती.

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