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हेलीकाप्टर से उड़ान हुई ,
संवेदना उनकी महान हुई !

घूमे ,फिरे ,खेले ,खाए ,
किस कदर थकान हुई !

ये जो मौत के मंज़र देखे,

कुदरत है ,मेहरबान हुई !

लोग हलकान और भूखे हैं,

खूब तक़रीर, परेशान हुई !

वोट गिनते आसमां में वो, 
कोई बस्ती श्मशान हुई !
 
_____________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल ,लखनऊ 

(मौलिक और अप्रकाशित )


 

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Comment

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Comment by वेदिका on June 24, 2013 at 7:09pm

तन्त्र पर तीक्ष्ण व्यंग किया है आपकी रचना पर ,,

पीड़ित  इलाके में एक उड़ान से जाने और वापस आ जाने  में ही उनके कर्तव्य की इति श्री हो जाती होगी!!!!  

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 24, 2013 at 8:06am

वोट गिनते आसमां में वो, 
कोई बस्ती श्मशान हुई !

कम शब्दों में तीखी बात ....

ये जो मौत के मंज़र देखे,

कुदरत है ,मेहरबान हुई !

Comment by sombirnaamdev on June 23, 2013 at 11:27pm

मुबारक हो शूकल  जी

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 23, 2013 at 10:07pm

D P Mathur साहब आपकी दृष्टि का हार्दिक आभार !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 23, 2013 at 10:06pm

आपका सस्नेह धन्यवाद  Priyanka singh !

Comment by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 23, 2013 at 10:04pm

आपका हार्दिक आभार MAHIMA  SHREE जी !

Comment by MAHIMA SHREE on June 23, 2013 at 8:22pm

क्या बात है  आदरणीय शुक्ल जी .. बहुत कम शब्दों में कितनी बड़ी बातें कह दी बधाई आपको  

Comment by Priyanka singh on June 23, 2013 at 6:52pm

खूब कहा सर ....बधाई 

Comment by D P Mathur on June 23, 2013 at 6:32pm

आदरणीय शुक्ल सर ,व्यंग्य रूप में आपका काव्य बहुत अच्छा लगा !

कृपया ध्यान दे...

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