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ज़िंदगी भली 

रुलाती भी है कभी 

करमजली !

~

~

आग ज़िंदगी 

अनुराग ज़िंदगी 

ज़िंदगी प्यास !

~

~

ज़िंदगी ,बहो 

दर्द हैं नदी जैसे 

कुछ न कहो !

~

~

फूलों ने डसा

काँटों ने सहलाया 

अहा ज़िंदगी !
~
~
टटोलें मन 
स्वयं प्रकाश-पुंज 

यही जीवन !
~
~
मुठियों में बंद 
आँधियों से न डर 

जी बेखटक !
~
~
मन प्रभात
मन ही दुपहर
सूरज है न !
~
~

सहेज मत 
दर्द की ये बांसुरी 
फेंक दे दूर !

~
~

शून्य से चले 

छू लेंगे ही अनंत 

जब भी अंत !

~

~

उड़ती रही 

हाथ पर तितली 

उड़ ही गई !

_______________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल ,लखनऊ 

(मौलिक और अप्रकाशित )



 

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Comment by sushila shivran on June 26, 2013 at 5:15pm

फूलों ने डसा

काँटों ने सहलाया 

अहा ज़िंदगी !

बहुत सुन्दर हाइकु। अन्य हाइकु भी प्रभावित करते हैं। बधाई वि० शु० जी !

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 24, 2013 at 8:38pm

आ0 विश्वम्भर सर जी,
‘टटोलें मन
स्वयं प्रकाश.पुंज
यही जीवन !‘
......अतिसुन्दर हाईकू। हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by coontee mukerji on June 24, 2013 at 5:13pm

आदरणिय  शुक्ला जी , आप की रचनाएं हमेशा से जीवन दर्शन से पूरीत अनुभवों कई नदियों बहाती चलती है . पाठक गण इसे खूब पसंद करते हैं...लेकिन यह कितना अच्छा होता अगर आप भी ओबीओ की रचनाओं पर अपना अमूल्य टिपणियों  प्रस्तुत करते . सभी नये लखको को यही आशा रहते हैं कि कोई विद्व जन उन्हें मार्ग्दर्शन कराएं.

फूलों ने डसा

काँटों ने सहलाया 

अहा ज़िंदगी !
~
~
टटोलें मन 
स्वयं प्रकाश-पुंज 

यही जीवन !.................सादर /कुंती.

Comment by वेदिका on June 24, 2013 at 12:53pm

 भावनाओं में भिगोई हुई बहुत ही खूबसूरत हाइकू के  प्रस्तुतिकरण पर  शुभकामनाऐं स्वीकारिये 

Comment by Shyam Narain Verma on June 24, 2013 at 11:50am

बहुत ही खूबसूरत पंक्तियों का प्रस्तुतिकरण आपने किया...' शुभकामनाऐं................................

Comment by aman kumar on June 24, 2013 at 9:29am

मुठियों में बंद 
आँधियों से न डर 

जी बेखटक !

आप हायकू विद्या मे माहिर है , हर बार हमे सिखने को मिलता है विशम्बर जी |

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 24, 2013 at 9:20am
आदरणीय..विश्वम्भर जी, भावनाओं में लिपटी हुई बहुत ही खूबसूरत पंक्तियों का प्रस्तुतिकरण आपने किया...' शुभकामनाऐं

कृपया ध्यान दे...

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