For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मैंने देखा है ज़िन्दगी को पास से 

मैंने सुना है  उन आंसुओं की  हर एक अवाज  को 
जो चुप चाप मन में घोर विषाद लिए निकल रहे हैं 
मैंने देखा है एक रोटी के लिए बिलखते मासूमों को,
जिन्होंने ज़िन्दगी का प्रथम चरण भी नहीं देखा 
जिन्हें मा कहना भी ढंग से नहीं आता,
सच बहुत दुःख होता है इनको देखकर,
क्यों ऐसा होता है ?
 
क्या इसीलिए भगवान् ने इन्हें पृथ्वी पर भेजा है ?
कोई जवाब दे सकता है, इन आंसुओं का 
क्या कोई इन् बच्चो को क्रीडा सिखा सकता है ?
अगर है हिम्मत तो, आगे बढ़ो
और इन मासूमों को भी,अपने हिस्से का सुख दो 
अपनों को तो हंसाते सब को देखा है,पर कभी 
गैरों को भी अपना कह के देखो    
मौलिक व अप्रकाशित 
 
  

Views: 691

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by RAHUL ROY on July 2, 2013 at 12:00pm

बहुत सुंदर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 1, 2013 at 7:45pm

गैरों को भी अपना कह कर देखो - वाह बहुत खूब 

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 1, 2013 at 4:00pm

भाई आपकी भावनाएं आपके उदार ह्रदय को दर्शा रही हैं, किन्तु यह सभी को भली भांति ज्ञात है कि बदलाव तभी संभव है जब प्रयास करने वाले हाँथ मजबूत हों. समय ऐसा आ गया है कि सकारात्मक सोंच रखने वाले लोग कम और नकारात्मक सोंच के लोग अधिक हैं, यदि कुछ लोग बदलने का प्रयास भी करते हैं तो उनकी निजी समस्याएं उनके आड़े आ जाती हैं और न चाहते हुए भी रास्ता बदलना पड़ता है. खैर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारे.

Comment by रविकर on July 1, 2013 at 10:30am

बड़ी चुनौती बंधुवर, सभी चाहते प्यार ।

किन्तु कहीं देना पड़े, झट करते तकरार ॥

बहुत बढ़िया है आदरणीय-

आभार-

Comment by vijay nikore on July 1, 2013 at 2:04am

भावाभिव्यक्ति अच्छी है, आदरणीय। बधाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by शुभांगना सिद्धि on June 30, 2013 at 8:31pm
मैंने देखा है एक रोटी के लिए बिलखते मासूमों को,
जिन्होंने ज़िन्दगी का प्रथम चरण भी नहीं देखा 
पीड़ा सचमुच पीड़ादायी है 
Comment by वेदिका on June 29, 2013 at 11:45pm

सुंदर भाव!! आपने बहुत वैचारिक भाव समेटे है। बाकि कुछ मै कहना चाहती हूँ  

कविता पर गद्य को न हावी होने दे।   

मन किया आपकी "पीड़ा" पढ़ के उसे कुछ अपने कातरता में ढ़ालने का  का,, कैसी लगी अपने मत से अवगत कराइए

 

मैंने देखा जब 

जिन्दगी को पास से 

बहुत पास से 

मैंने सुनी 

उन आँखों की सिसकियाँ 

जो  हिलकती है 

चुपचाप ही

मैंने देखा है 

रोटी के लिए

रोते बिलखते

भूखे मासूम को 

जिसने नही देखा

जिन्दगी का  

पहला पायेदान भी 

वह मासूम 

जिसे अभी माँ 

कहना भी नही आया 

सच! बहुत दुखा  दिल

आह! क्यों हुआ ऐसा 

अरे! क्यों हुआ ऐसा   

आपको इस सृजन पर बहुत बहुत बधाई! 

Comment by Dr Babban Jee on June 29, 2013 at 8:50pm

Aadarniya Vijay Sir, main aapki views and comments se sahmat hun. man ki pida ko byakat karne ke liye sundar shabdo ki jarurat nahin padti,,,,abhibyakti ko byakat karne ka koi niyam kanoon nahin hota hai 

 

Comment by विजय मिश्र on June 29, 2013 at 6:07pm
विकसित भारत के आंतरिक स्वरुप का यथार्थ चित्रण है आपकी रचना और अंत में एक न्योता जो आपके सजल हृदय को और सर्वतोकृष्ट मानवीय आचरण को प्रस्तुत करता है.जो सजग समाजसेवी हैं ,यथासामर्थ्य निश्चित रूप से इस विकराल दारिद्र्य का समन करने को उद्धत रहते हैं और करते भी हैं .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 29, 2013 at 4:55pm
आदरणीय ..देवेन्द्र जी, .सुंदर रचना अभिव्यक्ति 'हार्दिक शुभकामनाऐं व स्नेह....'

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
6 hours ago
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
7 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
9 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
13 hours ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
13 hours ago
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
13 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
14 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
20 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' shared their blog post on Facebook
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी"
May 24
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी"
May 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service