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वेदियों सा तप्त मन अपने लिए
कर रहा सारे हवन अपने लिए

अपनेपन को छोड़ मतलब साधते
दोस्त का होता चयन अपने लिए

मूढ़ मन में मैल ले गंगा नहा
कर रहा है आचमन अपने लिए

तितलियों को हांक कर भंवरे कहें
फूल कलियाँ हैं चमन अपने लिए

देश की है फ़िक्र किस इंसान को
हर कहीं चिंतन मनन अपने लिए

हिंदियों की नाक ऊँची कर रहा
पश्चिमी का ला चलन अपने लिए

आँख दिखलाता है वो माँ बाप को
संस्कृति का कर हनन अपने लिए

इश्क में है हर ख़ुशी दिलदार की
दर्द गम दिल की चुभन अपने लिए

“दीप” छोटों को बना कर सीढियां
हर बड़ा करता दमन अपने लिए

संदीप पटेल “दीप”

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 2, 2013 at 9:24pm

आदरणीया गीतिका दीदी, आदरणीय जीतेन्द्र जी , आदरणीय वीनस जी, आदरणीय प्राची जी , आदरणीया वंदना जी ... आप सभी का ह्रदय से धन्यवाद 

आदरणीय वीनस सर जी आपकी हर शेर पे वाह पाना मेरे ग़ज़ल कहने को उंचाई पे ले जाता है ये स्नेह यूँ ही बनाये रखिये सादर 

Comment by vandana on July 2, 2013 at 7:47am

वाह बहुत बढ़िया 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2013 at 7:29am

आ० संदीप पटेल जी 

बहुत ही खूबसूरत गज़ल लिखी है..

हर एक शेर जैसे ज़िंदगी की कसौटी पर कस-कस के निखारा गया है. बहुत सुन्दर.

बहुत बहुत बधाई.

Comment by वीनस केसरी on July 2, 2013 at 1:58am

वाह वा
भाई दिल खुश कर दिया आपने
एक एक शेर के लिए ढेरों दाद कबूल करें 

रदीफो कवाफ़ी को बहुत खूब निभाया आपने ....


Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 1, 2013 at 6:52pm
आदरणीय...संदीप जी, बहुत ही सुंदर गजल "मूढ़मन में मैल लेगंगा नहा कररहा है आचमन अपने लिए"" ...सच अपनी गजल में आपने 'गंगा में आप मन में मैल लेकर स्नान करने से जीवन सुधर नहीं जाता '.....आदरणीय..वास्तविकता लिए हुई गजल पर हार्दिक बधाई
Comment by वेदिका on July 1, 2013 at 3:05pm

वाह वा ह!!! बेहद सुंदर और चोट करती हुए गजल लिखी आपने आदरणीय संदीप भैया!  

तितलियों को हांक कर भंवरे कहें
फूल कलियाँ हैं चमन अपने लिए ,,वाह 

अपनेपन को छोड़ मतलब साधते
दोस्त का होता चयन अपने लिए,, वाह 

बड़े ही खूब सूरत अश'आर समावेशित 

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