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देवों की भूमि में जलजला

नजारा पहाड़ों का क्या हो गया ये |

गावों का देखो निशाँ खो गया है||

जो मुझको थे प्यारे कहाँ खो गये वो|

अभी तक थे जागे कहाँ सो गये वो||

मौतों का थमता न क्यों सिलसिला है|

ये देवों की भूमि में क्यों जलजला है||

 

जहाँ कल तक था जीवन अब मृत्यु खड़ी है|

जिधर जाती  नजरें  बस  लाशें  पड़ी हैं||

 

ये मानव की करनी कहाँ लेके आई|

अपनी ख़ुशी को ये दुनिया मिटाई||

 

पहाड़ों  से  चीखे  बेबस  जिंदगी  है|

थी कल ख़ुशी अब निरस जिंदगी है||

 

वो घर था न केवल यहाँ बह गया जो|

किसी का तो सारा जहां लुट गया है||

        

                   हरीश उप्रेती "करन"

                 मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment

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Comment by coontee mukerji on July 4, 2013 at 7:50pm

कुछ कहा नहीं जा सकता.....शायद होना ही था.प्रकृति कभी उधार नहीं छोड़ती.बस सब का कल्याण हो.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 4, 2013 at 7:38pm

देवभूमि में आयी विनाशकारी जलप्रलय पर बहुत यथार्थ प्रस्तुति दी है हरीश जी आपने..

इस भाव दशा पर क्या कहूँ.. दर्द के अतिरेक को क्या शब्द दूं..

बस शुभ की याचना ही है परमशक्ति से ..

Comment by Harish Upreti "Karan" on July 3, 2013 at 10:30pm

धन्यवाद् आदरणीय केवल प्रसाद जी........

Comment by Harish Upreti "Karan" on July 3, 2013 at 10:29pm

धन्यवाद आदरणीय अरुण जी....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on July 3, 2013 at 9:03pm

आदरणीय हरीश जी, इस मार्मिक रचना के लिए बधाई.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 3, 2013 at 8:40pm

आ0 हरीश भाई जी, ^वो घर था न केवल यहाँ बह गया जो!  किसी का तो सारा जहां लुट गया हैAA^... संवेदनाओं व श्रध्दांजलि का सुन्दर भाव।  बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by Sumit Naithani on July 3, 2013 at 2:22pm

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति 

Comment by वेदिका on July 3, 2013 at 1:51pm

भावनात्मक विचारों का संग्रह!!

रचना पर बधाई!!  

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 3, 2013 at 1:42pm
बहुत खूब, आदरणीय..हरीश जी हार्दिक बधाई
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 3, 2013 at 11:10am

सामयिक रचना अच्छा प्रयास बधाई स्वीकारे श्री हरीश उत्प्रेती जी 

कृपया ध्यान दे...

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