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ग़ज़ल:-मैं ही रुसवा हुआ

ग़ज़ल:-मैं ही रुसवा हुआ
मैं ही रुसवा हुआ ज़माने में
नाम उसका नहीं फ़साने में |

उन चरागों को दुआएं दे दूं
खुद जला मैं जिन्हें जलाने में |

चोंच खाली लिए लौटे पंछी
बच्चे भूखे रहे ठिकाने में |

कैसे कह दूं कि यह घर छोटा है
उम्र गुजरी इसे बनाने में |

तुम कि गंगा का दर्द क्या सुनते
तुम तो मशगूल थे नहाने में |

एक भरम है चमन की रंगों-बू
है मज़ा तितलियाँ उड़ाने में |

ताज में वे भी दफ़्न हैं 'अभिनव'
हाथ जिनके कटे बनाने में |

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on January 1, 2011 at 2:36pm

नुरैन अंसारी जी आभार और नए साल की मुबारकवाद !!!

Comment by Noorain Ansari on December 27, 2010 at 6:45pm
बहूत सुंदर ग़ज़ल..अभिनव जी..
 
तुम कि गंगा का दर्द क्या सुनते
तुम तो मशगूल थे नहाने में
Comment by Abhinav Arun on December 11, 2010 at 7:09pm

आभार रवि जी ! आपने ग़ज़ल पसंद की मन प्रसन्न और संतुष्ट हुआ |

Comment by Rash Bihari Ravi on December 10, 2010 at 2:18pm

khubsurat manmohak

Comment by Abhinav Arun on December 10, 2010 at 2:16pm

धन्यवाद वीरेन्द्र जी | ऐसी ग़ज़लें पसंद करने वाले कम ही मिलते हैं और जो हैं वो मुझे बेहद पसंद हैं|

Comment by Veerendra Jain on December 9, 2010 at 12:04pm
चोंच खाली लिए लौटे पंछी
बच्चे भूखे रहे ठिकाने में |

कैसे कह दूं कि यह घर छोटा है
उम्र गुजरी इसे बनाने में |
bahut hi badhiya Arun ji...
Comment by Abhinav Arun on December 8, 2010 at 3:44pm
भास्कर जी,नवीन जी,गज़ल पसंद करने और उससे बड़ी बात कि कमेन्ट के लिए दिल से आभार |आप लोग लिखते हैं तो हौसला मिलता है |
Comment by Bhasker Agrawal on December 8, 2010 at 3:03pm
उन चरागों को दुआएं दे दूं
खुद जला मैं जिन्हें जलाने में |...are wahh
Comment by Abhinav Arun on December 7, 2010 at 9:35am
आभार शेष जी ग़ज़ल पसंद की आपने |

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