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ग़ज़ल:-जिस रोज़ से आईना

ग़ज़ल:-जिस रोज़ से आईना

जिस रोज़ से आईना मेरे पास नहीं है
औरों को मेरी शक्ल का एहसास नहीं है |

उसको मैं अपने राज़ बताता भी किस तरह
बेहद अज़ीज़ है वो मेरा ख़ास नहीं है |

बूढ़े फ़कीर ने मुझे उड़ने की दुआ दी
फिर ये कहा तकदीर में आकाश नहीं है |

बेशक मेरे हैं पांव हुनर तेरा दिया है
तेरे बगैर चलने की अब आस नहीं है |

तालाब के करीब कहीं यक्ष तो नहीं
आकर क्यों लगा मुझको अभी प्यास नहीं हैं |

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Comment by Abhinav Arun on December 10, 2010 at 2:17pm

आभार वीरेंद्र जी |अप की तारीफ़ हौसला देती है |

Comment by Veerendra Jain on December 9, 2010 at 12:06pm
Waah Waah Arun ji...har sher par waah waah nikalti hai..
Comment by Abhinav Arun on December 8, 2010 at 3:47pm
भास्कर जी और नवीन जी पुनः धन्यवाद आप सबका स्नेह हौसला देता है |और सचमुच कमेन्ट बड़ा काम करता है |
Comment by Bhasker Agrawal on December 8, 2010 at 3:07pm
जिस रोज़ से आईना मेरे पास नहीं है
औरों को मेरी शक्ल का एहसास नहीं है |...pahla sher sunkar hi maza aa gaya...
aaj ka sach keh diya...bahut khoob
Comment by Abhinav Arun on December 7, 2010 at 9:41am
कुछ शेर छूट गए थे ...

एक फिक्र तेरी तोहमतें तमाम दे गयी
अफ़सोस तेरा मुझपर ही विश्वास नहीं है |

दिल गुज़रे हुए वक्त के लम्हों में दफ्न है
अब दूरियों के बोझ का आभास नहीं है |

औरों के कहकहों का सबब बनने लगी है
अभिनव' 'के दर्द में ग़ज़ल उदास नहीं है
Comment by Abhinav Arun on December 7, 2010 at 9:37am
लता जी आभारी हूँ कमेन्ट के लिए | रचना की सार्थकता लिखे जाने से ज्यादा उसे पढ़े जाने में ही है |
Comment by Lata R.Ojha on December 7, 2010 at 9:10am
तालाब के करीब कहीं यक्ष तो नहीं
आकर क्यों लगा मुझको अभी प्यास नहीं हैं

bahut sundar ...

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