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अनसुलझे प्रश्न // डॉ० प्राची

प्रकृति पुरुष सा सत्य चिरंतन 

कर अंतर विस्तृत प्रक्षेपण 

अटल काल पर

पदचिन्हों की थाप छोड़ता 

बिम्ब युक्ति का स्वप्न सुहाना...

अन्तः की प्राचीरों को खंडित कर

देता दस्तक.... उर-द्वार खड़ा 

मृगमारीची सम

अनजाना - जाना पहचाना... 

खामोशी से, मन ही मन

अनसुलझे प्रश्नों प्रतिप्रश्नों को 

फिर, उत्तर-उत्तर सुलझाता...

वो,

अलमस्त मदन 

अस्पृष्ट वदन 

गुनगुन गाये ऐसी सरगम 

हर सुप्त स्वप्न को दे थिरकन

क्षणभंगुर जग का हर बंधन ,

फिर भी,    क्यों ऐसे देवदूत से 

बंधन ये अन्अंत पुराना सा लगता है ?

क्यों एक अजनबी जाना पहचाना लगता है?

मौलिक एवं अप्रकाशित 

डॉ० प्राची 

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Comment by शिज्जु "शकूर" on July 4, 2013 at 2:10pm

 Dr.Prachi Singh ji 

आपकी प्रस्तुति लाजवाब है,वाह बधाई स्वीकार करें

''प्रकृति पुरुष सा सत्य चिरंतन
कर अंतर विस्तृत प्रक्षेपण
अटल काल पर
पदचिन्हों की थाप छोड़ता
बिम्ब युक्ति का स्वप्न सुहाना''

एक जगह मैं संशय में हूँ- पदचिन्हों की ''थाप'' छोड़ता
यहाँ ''छाप'' होगा कि ''थाप''

Comment by राजेश 'मृदु' on July 4, 2013 at 1:42pm

बहुत ही शानदार प्रस्‍तुति । बिम्‍ब युक्ति का स्‍वप्‍न सुहाना पुन: अनजाना - जाना पहचाना.,  खामोश भी गुनगुनाता भी देवदूत से बंधन ये । अद्भुत सामंजस्‍य है । मारीच भी मृग भी मृगेंद्र भी । जिस तरह से आपने हरेक पहलू को जोड़ा है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है । मन के ज्‍वार को इस तरह परिभाषित करना कि वह परिभाषा सर्वग्राह्य हो जाए बड़ा आनंददायक पर श्रमपूर्ण कार्य है । आपको हार्दिक बधाई इस प्रस्‍तुति पर

Comment by वेदिका on July 4, 2013 at 1:42pm

बहुत सराहनीय रचना आदरणीय प्राची दी!

मै पाठक को सलाह देना चाहूंगी की रचना को समय देके ही पाठन करे। केवल सरसरी दृष्टी से भर न देखे।

अतुकांत रचना के आदर्श को स्थापित करती हुयी प्रवाह मयी और तथ्यात्मक रचना पर बधाई स्वीकारे!!    

कृपया ध्यान दे...

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