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गज़ल 

बह्र : 2122  1212  22 

जाल सैयाद नें बिछाया है 

कैद में सोन पंछी आया है..

टीसता ज़ख्म पीपता रिश्ता 

सब्र की आड़ में छिपाया है..

हारी बाज़ी पलट  सका वो ही 

संग गम के जो मुस्कुराया है..

रात का चैन खो गया तो क्या 

ख्वाब तो चाँद का सजाया है..

फाँसले क्या उसे मिटाएंगे

उसकी हस्ती में सच समाया है..

कसमसाता रहा जो बरसों से 

राज़ वो आज लब पे आया है..

ज़िंदगी इश्क में फना करके 

गीत उल्फत का गुनगुनाया है..

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Comment

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Comment by Vasundhara pandey on August 14, 2013 at 9:45am
सुन्दर गजल प्राची जी ...बधाई !
Comment by वीनस केसरी on June 6, 2013 at 1:27am

खूबसूरत ग़ज़ल,
कहन और शिल्प के सुन्दर संयोजन ने ग़ज़ल के सौंदर्य को सरल और सहज रूप से बढ़ाया है 
ढेरो दाद ....

रात का चैन खो गया तो क्या 

ख्वाब तो चाँद का सजाया है.... बहुत खूब वाह वा


फाँसले क्या उसे मिटाएंगे

उसकी हस्ती में सच समाया है..... शानदार

कुछ शब्दों की अशुद्ध वर्तनी से पढ़ने में अटकाव महसूस हुआ
इन पर आपका ध्यानाकर्षण अपेक्षित है  .....

सैयाद - सय्याद
पंछी - पक्षी
फाँसले - फ़ासले


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2013 at 3:58pm

टीसता ज़ख्म पीपता रिश्ता 

सब्र की आड़ में छिपाया है..

    वाह वाह आपकी ग़ज़ल पढ़ कर बहुत अच्छा लगा प्रिय प्राची जी हर शेर शानदार दाद कबूल कीजिये 

Comment by अरुन 'अनन्त' on June 5, 2013 at 12:10pm

वाह दीदी वाह आनंद आ गया एक शानदार मुकम्मल ग़ज़ल दिल को छूने वाली इस सुन्दर ग़ज़ल हेतु अनन्त की ओर से अनन्त बधाई स्वीकारें.

Comment by कल्पना रामानी on June 5, 2013 at 12:07am

बहुत शानदार गजल प्राची जी, हार्दिक बधाई.... 

Comment by coontee mukerji on June 4, 2013 at 9:20pm

प्राची जी , अगर आपकी लिखित गज़ल अगर एक प्रयास है तो आप जब तबियत से लिखने लगगेंगी तब क्या होगा .......?

रात का चैन खो गया तो क्या 

ख्वाब तो चाँद का सजाया है........बहुत खूब .

सादर

कुंती

Comment by vijay nikore on June 4, 2013 at 9:02pm

आदरणीया प्राची जी:

 

हिन्दी हो या अन्ग्रेज़ी... गीत हो या नव गीत, नज़्म हो या गज़ल... आप किसी भी विधा को अपना कर

उसे शान दे देती हैं।

 

आपकी रचनाओं में गहरी सोच, कल्पना की उड़ान, एवं नए प्रतिबिम्ब सदैव समाहित रहते हैं।

 

//कसमसाता रहा जो बरसों से 

राज़ वो आज लब पे आया है..// ....   वाह, वाह,  वाह !

दिल से बधाई।

सादर,

विजय

 

 

Comment by MAHIMA SHREE on June 4, 2013 at 8:56pm

टीसता ज़ख्म पीपता रिश्ता 

सब्र की आड़ में छिपाया  है..

 

हारी बाज़ी उसी नें पलटी है 

संग गम के जो मुस्कुराया ..

 

कसमसाता रहा जो बरसों से 

राज़ वो आज लब पे आया है

नमस्कार आदरणीया प्राची जी ..

कमाल की गज़ल .. सरल शब्दों में गहन प्रस्तुती.. बधाई स्वीकार करें  

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 4, 2013 at 8:49pm

मेरे द्वारा किये गए इस गज़ल प्रयास को आप सभी सुधिजनों की उत्साहवर्धक सराहना मिली, मैं हृदय से आभारी हूँ.

सादर.

Comment by ram shiromani pathak on June 4, 2013 at 6:28pm

हारी बाज़ी उसी नें पलटी है 

संग गम के जो मुस्कुराया है..शानदार

आदरणीय प्राची जी,बहुत सुन्दर ग़ज़ल////

 हार्दिक बधाई स्वीकार करें! सादर

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