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तुलसी की चौपाई में

तमस मंथरा

के निवास में

ईच्‍छा जब

पग धरती है

**दश रथों की

धीर धुरी भी

विकल हाथ

बस मलती है

ऐसे में

अक्‍सर ही संयम

दूर भरत सा

रहता है

हो अधीर कुछ

मनस लखन भी

चाप चढ़ाए

फिरता है

बस विवेक तब

राम रूप में

सबको पार

लगाते हैं

ज्ञान तापसी

वेश सिया धर

बढ़ते चल

कह जाते हैं

इतना ही तो

लिखा हुआ है

तुलसी की

चौपाई में

कैसे-कैसे

अर्थ निकाले

कितनों ने

विषपायी ने

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

**(प्राण वायु के दस प्रकार)

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Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 7, 2013 at 9:22am
"शुरुआत में दमदार बात...तो अंत तक! क्या कहने....!पुन :बधाई आदरणीय...
Comment by वेदिका on July 7, 2013 at 9:12am

मुझे तो शुरू से आखिरी तक पूरी कविता दमदार लगी! 

प्राम्भ से लेकर आखिरी तक कविता ने अमित छाप छोड़ी है,,  

अतिशय  बधाइयाँ !!!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 7, 2013 at 8:59am
""तमस मंथरा

के निवास में

ईच्‍छा जब

पग धरतीहै"".....आदरणीय..शुरुआत ही में ही, दमदार बात ..! हार्दिक बधाई
Comment by वेदिका on July 7, 2013 at 6:48am

सौ की सीधी एक बात!!

हार्दिक बधाई! 

Comment by बृजेश नीरज on July 6, 2013 at 11:42pm

सच बात कही।
बहुत सुन्दर!
हार्दिक बधाई!

Comment by रविकर on July 5, 2013 at 8:36pm

क्या बात है-
आदरणीय-
आभार आपका-

Comment by coontee mukerji on July 5, 2013 at 7:23pm

आपने थोड़े से शब्दों में बहुत ही सुंदर ढ़ग से रामचरित मानस के पात्रों का चित्रण किया है.बहुत सुंदर.

सादर

कुंती.

Comment by ram shiromani pathak on July 5, 2013 at 7:09pm

वाह भाई बहुत ही सुन्दर व् सटीक चित्रण किया है आपने//हार्दिक बधाई आपको

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 5, 2013 at 4:25pm

वाह वाह ! भाई राजेश कुमार झा साहब, संत तुलसीदास जी की चौपाई में लिखे का निचोड़ निकाल कर रख

दिया आपने अपनी तरह की चार चोपाई में |मंथरा के कारण श्री दशरथ जी की धैर्य धुरी टूटने से लेकर प्रभु राम

की धीरजता का सुन्दर शिल्प और संक्षिप्त में वर्णन सुंदर और गागर में सागर सा लगा | इसके लिए दिल से ढेरों

बधाइयां स्वीकारे करे | शुभम | जय श्री राम 

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