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राजू मोबाइल से गाना सुनने में मस्त था- "वो इक लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था।"
तब तक उसके कानों में पिता जी की आवाज गूंजी- "सूरदास का पद नहीं सुन सकते थे क्या? या मीरा, तुलसी, कबीर का भजन सुनते?"
राजू डर गया और उसने गाना सुनना बंद कर दिया।
दो दिन बाद की बात है पिता जी अपने मोबाइल से गीत सुन रहे थे-"धूप में निकला न करो रूप की रानी, गोरा रंग काला न पड़ जाये।"
तब तक उनके कानों में आवाज गूँजी- "पिता जी! यह किसका पद या भजन है?"

मौलिक व अप्रकाशित
(संशोधित)

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 11, 2013 at 11:19am
आदरणीया गीतिका वेदिका जी! रचना की सराहना और उसके भाव के उद्घाटन के लिये हार्दिक आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 11, 2013 at 11:17am
आदरणीय राजेश कुमारी जी! रचना की सराहना के लिये हार्दिक आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 11, 2013 at 11:14am
अजीतंद्र पाण्डेय जी! रचना की सराहना के लिये हार्दिक आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 11, 2013 at 11:13am
भाई केवल प्रसाद जी! रचना की सराहना और मर्म तक पहुंचने के लिये हार्दिक आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 11, 2013 at 11:11am
भाई रामशिरोमणि जी! रचना की सराहना के लिये हार्दिक आभार।
Comment by वीनस केसरी on July 11, 2013 at 1:24am

बस एक शब्द .............अस्वाभाविक

Comment by वेदिका on July 10, 2013 at 9:57pm

बहुत सही :)))

//तब तक उनके कानों में आवाज गूँजी- "तो पिता जी! ये है सूरदास का पद, मीरा, तुलसी और कबीर का भजन?"// ,,,बेचारा बच्चा "सच" अपने मुंह से बोल तक नही पाया, और क्या संस्कार चाहिए बच्चो में,,

:))))))  

हार्दिक बधाई! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 10, 2013 at 9:49pm

बच्चों को कोई सीख तभी असर करती है जब हम बड़े भी उस पर अमल करते हों बहुत अच्छा कटाक्ष बधाई इस लघु कथा हेतु 

Comment by yatindra pandey on July 10, 2013 at 8:39pm

sahi kaha sundar

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 10, 2013 at 8:28pm

आ0 विन्ध्येश्वरी  भाई जी,  बहुत शानदार  !...हा हा हहह.. जी भाई!  ऐसा ही होता है, जब हम स्वयं के मन पर अंकुश नही रखते हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

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