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आस्था या अनास्था

जब से खबर आयी है माँ का चित्त स्थिर नहीं है तीन दिन तो बड़ी बैचेनी में गुजरे। बार बार दरवाजे तक जाती अकेली खड़ी सूनी सड़क को घंटों तकती रहती फोन की घंटी पर दौड़ पड़ती तो कभी कभी यूँ ही फोन को घूरती रहती कभी बिना घंटी बजे ही फोन उठा कर कान से लगा लेती देखने के लिए की कहीं फोन बंद तो नहीं है .देवघर में दीपक तो पहली खबर के साथ ही लगा दिया था बार बार जा कर उसमे तेल भरती जलती हुई बाती को उँगलियों से ठीक करती और दोनों हाथ जोड़ कर सर तक ले जाती .

बेटे बहू ,बेटी दामाद और नाती पोते केदारनाथ गए थे .आसमान से प्रलय बरसा और रस्ते में आने वालो को बहा ले गया .कल बेटे का फोन आया था वे लोग एक दूसरे से बिछड़ गए हैं और फोन कट गया .तब से माँ की हालत बाबरी सी हो गयी है . फिर एक बार फोन की घंटी बजी जो खबर आयी समझ नहीं आया अच्छी है या बुरी .जितने गए थे उससे आधे लोग कल वापस आ रहे है बाकियों की कोई आस बाकी नहीं बची है .सबके दिलों में सन्नाटा पसर गया .दीपक में तेल डालती माँ के हाथ काँप रहे थे भगवान तुम्हारी कृपा के लिए धन्यवाद दूँ या मासूमों पर तुम्हारे क्रोध  के लिए शिकायत करूँ ? 
कविता वर्मा 
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 11, 2013 at 6:42pm

बहुत सही चित्रण सचमुच मेरे साले के साडू और मेरे पुराने शहर वाले मौहल्ले के सज्जन के बेटी-जंवाई सहित पूरा परिवार 

आज दिनाक तक लापता है और अब धीरे धीरे असमंजस की पीड़ा स्थाई पीड़ा में बदलती दिख रही है, जिसे यथार्थ में 

अनुभव करते हुए आपकी रचना ने सहसा याद दिला दी | इस प्रकार की बैचेनी का सुन्दर वर्णन | बधाई स्वीकारे आदरणीया 

कविता वर्मा जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 11, 2013 at 6:30pm

अपनों की जब तक सुधि न मिले... तब तक मन की बेचैनी का बहुत यथार्थ वर्णन 

//भगवान तुम्हारी कृपा के लिए धन्यवाद दूँ या मासूमों पर तुम्हारे क्रोध  के लिए शिकायत करूँ//...असमंजस पीड़ा की इन्तेहाँ के साथ कुछ की सलामती की बेपनाह खुशी... जिनपर गुज़रती होगी कैसा महसूस होता होगा यह कल्पनातीत है...आपने उसे शब्द देने की बहुत अच्छी कोशिश की है 

सादर शुभकामनाएं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 11, 2013 at 3:55pm

मर्माहत ऊहापोह को सुगढ अभिव्यक्ति मिली है. आप प्रयासरत रहें

शब्दाक्षरियों के प्रति संवेदनशील रहें. शब्दों की अशुद्धियाँ वाचन के आनन्द में खलल डालती हैं.

शुभेच्छाएँ

Comment by D P Mathur on July 11, 2013 at 9:06am

प्रत्येक दुख में प्रभु पर ही  विश्वास और आस्था बनी रहती है..

Comment by ram shiromani pathak on July 10, 2013 at 7:04pm

बहुत सुन्दर चित्रण आदरणीया //हार्दिक बधाई 

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