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शिखर को छूने की चाहत में

जमीन को भूल गया हूँ 

झूठ को जीते जीते 

सच को भूल गया हूँ... 

खुद्दार हैं वो जो 

मर के भी जीते हैं 

बेबसी हमारी हम 

जी के भी मरते हैं 

सच है चराग जलाने से 

अंधेरा मिटेगा 

मगर वो आचरण कहाँ से आए 

जिससे पाप मिटेगा .... 

कतरा कतरा जमा करो 

समंदर बनेगा 

अपना हृदय विशाल करो

जिसमे वो बहेगा ....

आंखे बंद करने से  अंधेरा 

होगा रात नहीं होती 

भगवान के घर देर है 

अंधेर नहीं होती .... 

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 421

Comment

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Comment by Amod Kumar Srivastava on July 11, 2013 at 9:49pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय प्राची जी, लक्ष्मण जी, सौरभ पांडे जी एवं श्याम नारायण वर्मा  जी .... उत्साह वर्धन के लिए.... आशा करता  हूँ कि आपका आशीर्वचन  बना रहेगा .... 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 11, 2013 at 7:11pm

प्रखर सशक्त कथ्य समृद्ध अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई आ० आमोद श्रीवास्तव जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 11, 2013 at 6:33pm

खुद्दार हैं वो जो 

मर के भी जीते हैं 

बेबसी हमारी हम 

जी के भी मरते हैं --वाह ! बहुत खूब कहा है 

आंखे बंद करने से  अंधेरा 

होगा रात नहीं होती 

भगवान के घर देर है 

अंधेर नहीं होती ..--------बिलकुल यथार्थ कहा है | पूरी रचना ही बहुत सुन्दर | हार्दिक बधाई भाई आमोद जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 11, 2013 at 5:43pm

भाई आमोद जी, आपकी प्रस्तुत रचना का तथ्य गंभीर तथा सनातन है. बधाई स्वीकारें

आपकी अन्य रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी.

शुभम्

Comment by Shyam Narain Verma on July 11, 2013 at 11:00am

बहुत ही सुन्दर रचना , हार्दिक बधाई......................................."

कृपया ध्यान दे...

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