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मंद हवा की

लहरों पर बैठ

आकाश ने

हाथों में लिया

सितारों का अक्षत,

अरूणोदय का कुमकुम,

ओस की बूंदें,

बाग से

पुष्प, घास

और तिरोहित कर दी

रात

क्षितिज में।

              - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2013 at 5:03pm

आदरणीय निकोर साहब आपका हार्दिक आभार!

Comment by vijay nikore on July 12, 2013 at 5:02pm

 

अति सुन्दर रचना के लिए बधाई, आदरणीय।

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2013 at 4:42pm

आदरणीय राजेश जी इस उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार!

वास्तविकता देखें तो संक्रमित तो मैं हुआ हूं आपकी रचनाओं से।
आपका बहुत आभार!
सादर!

Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2013 at 4:39pm

आदरणीय लाडलीवाल जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2013 at 4:38pm

आदरणीय माथुर साहब आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2013 at 4:36pm

आदरणीय सुमित जी आपका आभार!

Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2013 at 4:30pm

आदरणीया प्राची जी उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार!  

Comment by राजेश 'मृदु' on July 12, 2013 at 3:17pm

ये तो गड़बड़ झाला है, आप ऐसे कल्‍पना नहीं कर सकते---- मैं तो अवाक् हूं कि आखिर कैसे आपने ऐसे सोच लिया । आपकी यह अभिव्‍यक्ति बड़ी संक्रामक हो सकती है, कम से कम इसने मुझे तो संक्रमित कर ही दिया । सुना था संत ध्‍यानस्‍थ होते हैं पर रचनाकार भी ध्‍यानस्‍थ हो सकते हैं यह प्रत्‍यक्ष देख रहा हूं । बहुत ही उन्‍नत भावों वाली अभिव्‍यक्ति है ये, सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 12, 2013 at 1:43pm

प्रकृति का सुन्दर अहसास कर चित्रण करने हेतु सुन्दर शब्द संयोजन के लिए बधाई श्री ब्रिजेश नीरज जी 

क्षितिज तिरोहित हो न सकी 

जब जब क्षितिज को पकड़ने का यत्न किया 

क्षितिज हर बार दूर होता चला गया |

आँख खुली तो पता लगा 

खितिज़ को मैने अहसास किया 

देखा, पर क्षितिज का अस्तित्व 

नहीं मिला | - लक्ष्मण 

Comment by D P Mathur on July 12, 2013 at 11:30am

आदरणीय बृजेश जी सदा की भांति सुन्दर चित्रण !      

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