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वो मानते हैं कि हो सकती उनसे कोई खता नहीं

खुद तक तो खुदा के सिवा कोई और पहुंचता नहीं|

वो जुस्तजू करते हैं हमारे क़दमों के निशाँ की भी

उनके हाथों में छुपे खंजर को तो कोई खोजता नहीं|

वो जिन्होंने तय की हैं बुलंदियां लाशों की सीढ़ी पे

कदमों में लगे खून से कब फिसल जाएँ पता नहीं|

वो हो जाते हैं नाराज़ हमारी ज़रा सी लडखडाहट से

जैसे उनके जहां में मदमस्त तो कोई गिरता नहीं|

वो हैं जैसे भी दूर उनसे सोच में भी नहीं हो सकते

बिना किनारों के तो कोई धारा सागर में बहता नहीं|

 

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 26, 2013 at 11:50pm

वीनस जी आपकी दाद के लिए तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 26, 2013 at 11:50pm

धन्यवाद अरविन्द अम्बर जी साहब

Comment by वीनस केसरी on July 27, 2013 at 1:13am

वाह भाई जी बहुत खूब ....

Comment by arvind ambar on July 25, 2013 at 4:17pm

waaaaaaaaaaaaaaaaaah

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 25, 2013 at 8:38am

आदरनीय डॉ आशुतोष जी मिश्रा, आपका बहुत बहुत आभार !

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 25, 2013 at 8:38am

केतन परमार जी, आपकी शुभकामनाओं के लिए तहे दिल से धन्यवाद !!

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 25, 2013 at 8:37am

अनुपमा बाजपाई जी, आप हार्दिक आभार !

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 25, 2013 at 8:37am

सौरभ पाण्डेय जी, आपकी राय के तहे दिल से धन्यवाद, आगे से  वज़्न को भी ग़ज़ल की प्रस्तुति के साथ दिया करूंगा|

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 24, 2013 at 9:52pm

मन को छु गयी ये रचना ..सादर बधाई 

Comment by Ketan Parmar on July 24, 2013 at 11:51am

आपके प्रयास के प्रति शुभकामनाएँ.

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