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साँसें जब करने लगीं, साँसों से संवाद

जुबाँ समझ पाई तभी, गर्म हवा का स्वाद

 

हँसी तुम्हारी, क्रीम सी, मलता हूँ दिन रात

अब क्या कर लेंगे भला, धूप, ठंढ, बरसात

 

आशिक सारे नीर से, कुछ पल देते साथ

पति साबुन जैसा, गले, किंतु न छोड़े हाथ

 

सिहरें, तपें, पसीजकर, मिल जाएँ जब गात

त्वचा त्वचा से तब कहे, अपने दिल की बात

 

छिटकी गोरे गाल से, जब गर्मी की धूप

सारा अम्बर जल उठा, सूरज ढूँढे कूप

 

प्रिंटर तेरे रूप का, मन का पृष्ठ सुधार

छाप रहा है रात दिन, प्यार, प्यार, बस प्यार

 

तपता तन छूकर उड़ीं, वर्षा बूँद अनेक

अजरज से सब देखते, भीगा सूरज एक

 

भीतर है कड़वा नशा, बाहर चमचम रूप

बोतल दारू की लगे, तेरा ही प्रारूप

-----------

(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

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Comment by Shyam Narain Verma on July 16, 2013 at 1:14pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..
Comment by बसंत नेमा on July 16, 2013 at 11:42am

आशिक सारे नीर से, कुछ पल देते साथ

पति साबुन जैसा, गले, किंतु न छोड़े हाथ 

आ0 धर्मेन्द्र जी  बहुत  सुन्दर बहुत खूब .... बधाई शुभकामनाये 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 15, 2013 at 10:36pm

आहूत सुन्दर हास्य रस और श्रृंगार रस का सम्मिलित रूप, वाह बहुत खूब !मन के भा गए, हार्दिक बधाई स्वीकार करे 

श्री धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी | सादर 

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 15, 2013 at 10:07pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी सादर, सभी दोहे सुन्दर हैं. श्रृंगार के साथ ही कहीं कहीं हास्य भी उभर रहा है.बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on July 15, 2013 at 6:43pm

हार्दिक बधाई, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on July 15, 2013 at 5:00pm

अद्भुत रचना है आपकी, हार्दिक बधाई, सादर

कृपया ध्यान दे...

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