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कभी यूं ही बैठकर सोचते हुए

कल्पना की असीम गहराइयों में

डूबते उतराते

भाव ध्वनियां बनकर

खुद रूप लेने लगते हैं

शब्द का।

 

शब्द बोलते हैं

एक भाषा

और फिर

गडमड हो जाते हैं

एक दूसरे में।

 

रह जाती है

एक ध्वनि

एक स्वर

वह जो

परम भाव है

परम ध्वनि

परम अक्षर!

 

जहां से उपजे

वहीं समा गए

परम शून्य में।

निर्विकार शान्ति!

 

भाव मिले जब शून्य को, मन में ज्ञान समाय।

तन माटी से ऊपजा, तन माटी मिल जाय।।

                - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on July 17, 2013 at 5:47pm

आदरणीय विजय जी आपका बहुत बहुत आभार! आपकी टिप्पणी मेरे लिए किसी पुरुस्कार के समान है। नीरज की जो व्याख्या आपने दी उस ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया। आभार, आभार, आभार!

Comment by बृजेश नीरज on July 17, 2013 at 5:44pm

आदरणीया वंदना जी आपका हार्दिक आभार!

‘गडमड’ मैंने mixed up के संदर्भ में प्रयोग किया है। मुझे यही शब्द ध्यान आया था। यदि कुछ त्रुटि हो तो संशोधन अवश्य सुझाएं।

सादर!

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 17, 2013 at 1:56pm

आदरणीय बृजेश जी सुन्दर रचना. सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by vijay nikore on July 17, 2013 at 1:24pm

इस भावपूर्ण सुन्दर रचना के लिए बधाई, आदरणीय।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 17, 2013 at 1:14pm

वाह आदरणीय बृजेश भाई जी वाह मुग्ध कर दिया आपने इस सुन्दर प्रस्तुति से कुछ क्षण तक पंक्तियों की गहराई में डूबा रहा, अंत में प्रस्तुत दोहा चार चाँद जड़ गया. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by विजय मिश्र on July 17, 2013 at 11:33am
इन्हीं डूबते-तैरते और गडमड होते भावों की छकनी से छनकर जो शब्द मस्तिष्क और मन को हिलोरती हैं ,हमें बाध्य करतीं हैं कागज पर उतारने को और यही है एक कवि की सृजनशीलता जो अथक पीड़ा सहकर जन्म देती है एक सार्थक और प्रेरक रचना को .उत्तम भाव संप्रेषण .आभार नीरजजी . रज की शून्यता तो आपके नाम में भी है शेष में कहाँ मिलेगा ?
Comment by Vindu Babu on July 17, 2013 at 8:09am
वाह आदरणीय!
इतने गहन और यथार्थ भावों से सुसज्जित रचना पढ़कर मन का शून्य से साक्षात्कार और निर्विकार शान्ति की एक झलक प्राप्त होने का सौभाग्य मिला।
सादर धन्यवाद आपको, हृदयातल तक पैठ बनाने वाली यह रचना प्रदान करने लिए।
सर एक शब्द नहीं समझ सकी 'गडमड'!
Comment by बृजेश नीरज on July 16, 2013 at 11:00pm

आदरणीय केवल भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 16, 2013 at 10:20pm

आ0 बृजेश भाई जी,
‘शब्द बोलते हैं
एक भाषा
और फिर
गडमड हो जाते हैं
एक दूसरे में।‘....वाह क्या बात है...। सुन्दर रचना। हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by बृजेश नीरज on July 16, 2013 at 9:41pm

आदरणीय बागी जी आपका हार्दिक आभार! आपको रचना पसंद आयी, मेरा प्रयास सार्थक हुआ।

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