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इतना ओवर री एक्ट क्यूँ कर रही हो ऋतिका! मुंह कब तक फुलाए रखोगी ऐसा  क्या कर दिया मैंने? तुम ही तो चाहती थी कि मैं तुम्हारी तरह समाज सेवा करूँ इसी लिए तो उस एक्सीडेंट के केस को अपनी कार  में उठा के लाया पूरी कार ब्लड से गन्दी भी करवाई ,अपने हॉस्पिटल में एडमिट भी किया और ट्रीट मेंट भी कर रहा हूँ और क्या चाहिए तुमको ? और अच्छी खासी रकम  भी तो ली है ये क्यूँ नहीं कहते!!! ,ऋतिका का दबा गुस्सा मानो अचानक ज्वाला मुखी बनकर फूट  निकला ,केवल दो किलोमीटर पीछे हुए एक्सीडेंट का वो बेचारा पेशेंट साइकिल वाला था ना और ये कार वाला, क्या ये  अंतर मैं नहीं समझती ,कम से कम भगवान् से तो डरो भले ही मैं डॉ. नहीं हूँ पर इतना तो मुझे भी पता है की डाक्टर बनते वक़्त आप लोग क्या-क्या शपथ खाते हो!!!    

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 18, 2013 at 12:18pm

आदरणीय सौरभ  जी लघु कथा का  मर्म  संप्रेक्षण ठीक लगा  लिखना सार्थक हुआ दिल से आभार 

Comment by बृजेश नीरज on July 18, 2013 at 11:39am

आदरणीया इस लघुकथा पर आपको हार्दिक बधाई!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 18, 2013 at 9:02am

" सेवा में स्वार्थ हुआ , तो काहे की सेवा..."  बहुत सटीक लघु कथा पर हार्दिक बधाई..आदरणीया..राजेश कुमारी जी..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 18, 2013 at 12:50am

हुम्म्म.. .  तो ये राज़ है अचानक से दिल के दरिया हो जाने का !

तथ्य बहुत सटीक कथ्य बन कर आया है.   बधाई, आदरणीया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 17, 2013 at 9:45pm

हार्दिक आभार किशन कुमार जी आप इस  लघुकथा के मर्म तक पंहुचे 

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