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!!! चौपाई !!!

//प्रत्येक चरण में 16 मात्राएं, अन्त में दो गुरू या एक गुरू दो लघु होता है। जगण-121 तथा तगण-221 निषेध है//

मेघ तुम्हारा तन है काला।
मन है निर्मल गंगा वाला।!

चाल तुम्हारी गड़बड़ झाला।
बोल कड़क बिजली भय वाला।।

बरसे झम-झम हवा झकोरे।
रिसता तरल अमी वन भोरे।।

खेत खलिहान हुए विभोरे।
कृषक चले तन हल धर जोरे।।

हरषे रिम-झिम सावन जैसे।
छपरा झर-झर झरता तैसे।।

विरहनियां मन एक अकेली।
भीगे घर-तन हाय! सहेली।।

के0पी0सत्यम/मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 28, 2013 at 9:24pm

आ0 सौरभ सर जी, सादर नमन!
बोल कड़क बिजली भय वाला का क्या अर्थ ? इसलिये पूछ रहा हूँ कि व्याकरण के लिहाज से कुछ बात बन नहीं रही है.........बातें कर्कश, बिजली की तरह डराने वाला।
दूसरे, खेत - खलिहान कहने में ठीक है लेकिन खेत के त्रिकल के बाद खलिहान के खलिहा का चौकल लय भंग की स्थिति बना रहा है...---.खेत + खलि + हान------- मेरा यही आशय था।
एक बात:
//जगण.121 तथा तगण.221 निषेध है//......... सर जी!  मेरा आशय चरण के अन्त में था।
चौपाई में कहाँ? किस स्थान पर जगण और तगण निषेध है? यदि पद में कहीं भीए तो फिर जय कपीश तिहुँ लोक उजागर में कपीश क्या है?
आपके स्नेह, आशीष और उत्साहवर्धन हेतु आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार। सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 28, 2013 at 8:42pm

आ0 अन्नपूर्णा जी,   उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 28, 2013 at 8:42pm

आ0 बृजेश भाई जी,   उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार।  सादर,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 24, 2013 at 10:18am

भाईजी,  भाव दशा से इ सुन्दर प्रयास के लिए बधाई.

बोल कड़क बिजली भय वाला का क्या अर्थ ? इसलिये पूछ रहा हूँ कि व्याकरण के लिहाज से कुछ बात बन नहीं रही है. दूसरे, खेत-खलिहान कहने में ठीक है लेकिन खेत के त्रिकल के बाद खलिहान के खलिहा का चौकल लय भंग की स्थिति बना रहा है.

एक बात:

//जगण-121 तथा तगण-221 निषेध है//

चौपाई में कहाँ ? किस स्थान पर जगण  और तगण निषेध है ?  यदि पद में कहीं भी, तो फिर जय कपीश तिहुँ लोक उजागर  में कपीश क्या है ?

Comment by annapurna bajpai on July 23, 2013 at 7:31pm

adarniy kewal bhai ji , khubsurat chaupaiyon ke liye badhai .

Comment by बृजेश नीरज on July 22, 2013 at 8:04pm

आदरणीय केवल जी इस सुन्दर रचना पर आपको हार्दिक बधाई!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 20, 2013 at 7:41pm

आ0 जितेन्द्र भाई जी,  आपके स्नेह और रचना अनुमोदन के लिए आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 20, 2013 at 7:40pm

आ0 अभिनव भाई जी,  आपके स्नेह और रचना अनुमोदन के लिए आपका बहुत-बहुत हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 20, 2013 at 7:38pm

आ0 श्याम नारायण भाई जी,  आपके स्नेह और रचना अनुमोदन के लिए आपका हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 20, 2013 at 5:41pm

"खेत खलिहान हुए विभोरे।
कृषक चले तन हल धर जोरे।।"...आदरणीय..केवल जी, सुंदर अति सुंदर चौपाईयां....हार्दिक बधाई स्वीकार करें

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