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नवगीत//उत्तर यहीं अड़ा है//'कल्पना रामानी'

 

पावस का इस बार भूमि पर

प्यार बहुत उमड़ा है।

लेकिन क्या सुख संचय होगा?

संशय नाग

खड़ा है।

 

मक्कारी, गद्दारी, लालच,

शासन के कलपुर्ज़े। 

बूँद-बूँद को चट कर देंगे,

घन बरसे या गरजे।

 

भरे सकल जल-स्रोत लबालब,

सागर ज्वार चढ़ा है।  

मगर उसे नल नहलाएगा?

चिंतित मलिन

घड़ा है।

 

बन मशीन मानव ने भू के,

रोम-रोम को वेधा।

क्यों कुदरत फिर क्षुब्ध न होगी,

रुष्ट न होंगे मेघा!

 

अमृत वर्षा से खेतों का,

कण-कण जाग पड़ा है।

पर किसान का उत्सव होगा?

उत्तर यहीं

अड़ा है।

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

----कल्पना रामानी

Views: 704

Comment

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Comment by Vindu Babu on July 29, 2013 at 5:44pm
आदरेया समसामयिक चित्र प्रस्तुत करता हुआ बहुत ही प्रभावशाली नवगीत रचा है आपने। महत्वपूर्ण प्रश्नों को इतनी सौम्यता से उजागर करने के लिए आपको ढेरों ढेर बधाइयां महोदया।
सादर
Comment by Satyanarayan Singh on July 28, 2013 at 1:11pm

आदरेया

     अति सुन्दर नवगीत

               हार्दिक बधाई स्वीकार करें .

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 27, 2013 at 6:43pm

आ0 कल्पना रामानी जी,    वाह!  अद्भुत, अतिसुन्दर मन को झकझोरती समसामयिक नवगीत। हृदयतल से बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by Shyam Narain Verma on July 27, 2013 at 6:04pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ................
Comment by विजय मिश्र on July 27, 2013 at 1:30pm
वर्तमान की विसंगतियों पर करारा प्रहार है , चेतनाशून्य हो चले इस सत्तातंत्र पर सही चोट है . हताश ,व्यग्र और क्षुब्ध सामान्यजन की पीड़ा उभरकर आई है आपकी पँक्तियों में. सामयिक रचना केलिए साधुवाद कल्पना दीदी .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 27, 2013 at 10:04am

"पावस का इस बार भूमि पर

प्यार बहुत उमड़ा है।

लेकिन क्या सुख संचय होगा?

संशय नाग

खड़ा है।".................................

आदरणीया  कल्पना जी , नवगीत  रचना  में  यह पंक्ति बहुत खूब सूरत  है। 

सुंदर  रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें .
Comment by वीनस केसरी on July 27, 2013 at 1:20am

पर किसान का उत्सव होगा?

उत्तर यहीं

अड़ा है।


नव्यता को पहचान देता हुआ अद्भुत नवगीत है ...

कृपया ध्यान दे...

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