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फूल चम्पा के सब खो गए
जब से हम शह्र के हो गए

रात फिर बेसुरी धुन बजाती रही
दोपहर भोर पर मुस्कुराती रही
रतजगों की फसल
काटने के लिए
बीज बेचैनी के बो गए

प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी
ताका झाकी का मोहताज़ है आदमी
आयेगा एक दिन
जब सुनेंगे यही
लीक पर्चे सभी हो गए

मौल श्री से हैं झरते नहीं फूल अब 

गुलमोहर के तले है न स्कूल अब
अब न अठखेलियाँ
चम्पई उंगलियाँ
स्वप्न आये न फिर जो गए

(मौलिक अवं अप्रकाशित)

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 15, 2013 at 10:12am

प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी
ताका झाकी का मोहताज़ है आदमी 
आयेगा एक दिन
जब सुनेंगे यही
लीक पर्चे सभी हो गए.....सुंदर रचना ...सादर बधाई के साथ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 8, 2013 at 9:33am

आदरणीय  Laxman Prasad Ladiwala जी गीत पसंद करने के लिए शुक्रिया|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 8, 2013 at 9:32am

आदरणीय राज़ नवादवी  साहब आपने गीत को सराहा मेरा लेखन सफल हुआ| मशकूर हूँ|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 8, 2013 at 9:30am

आदरणीया Dr.Prachi Singh जी आपकी सकारात्मक टिपण्णी ही मेरा संबल है| हार्दिक धन्यवाद|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 8, 2013 at 9:29am

आदरणीय  vijay nikore जी गीत को सराहने के लिए हार्दिक धन्यवाद|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 8, 2013 at 9:28am

आदरणीया  Vasundhara pandey जी गीत पसंद करने के लिए शुक्रिया|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 8, 2013 at 9:27am

आदरणीय Arun Srivastava जी गीत पसंद करने के लिए आभार|

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 7, 2013 at 11:52am

मौल श्री से हैं झरते नहीं फूल अब 

गुलमोहर के तले है न स्कूल अब
अब न अठखेलियाँ
चम्पई उंगलियाँ 
स्वप्न आये न फिर जो गए

'फूल चम्पा के सब खो गए 
जब से हम शह्र के हो गए' -----बहुत सुन्दर और भापूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई श्री राना प्रताप सिंह जी 

Comment by राज़ नवादवी on August 7, 2013 at 11:45am

'फूल चम्पा के सब खो गए 
जब से हम शह्र के हो गए'

'मौल श्री से हैं झरते नहीं फूल अब 

गुलमोहर के तले है न स्कूल अब'

एक एक पंक्ति दिल से निकली और दिल को छू जाने वाली.... समीचीन, समसामयिक, और उतनी ही भाव और भंगिमा से पूर्ण. एक झरना पहाड़ियों से अभी निकला और अभी ओझल हो गया....आपकी कविता कुछ इस गति से बढ़ती और अपने उत्कर्ष पे पहुँचती है. बधाई स्वीकार करें. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 7, 2013 at 11:15am

गहन भावानुभूतियों को सुकोमल हृदयस्पर्शी शब्दरूप दे नवगीत में ढाला है..

हर बंद नें रोक लिया कुछ पल खामोशी से डूबने उतराने के लिए....इन तीनों बन्दों की अनुगूँज मनसपटल पर दीर्घकालिक स्पंदन छोड़ने में सक्षम है..

बहुत बहुत बधाई इस अभिव्यक्ति पर आदरणीय राणा प्रताप सिंह जी 

सादर.

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