For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

फूल चम्पा के सब खो गए
जब से हम शह्र के हो गए

रात फिर बेसुरी धुन बजाती रही
दोपहर भोर पर मुस्कुराती रही
रतजगों की फसल
काटने के लिए
बीज बेचैनी के बो गए

प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी
ताका झाकी का मोहताज़ है आदमी
आयेगा एक दिन
जब सुनेंगे यही
लीक पर्चे सभी हो गए

मौल श्री से हैं झरते नहीं फूल अब 

गुलमोहर के तले है न स्कूल अब
अब न अठखेलियाँ
चम्पई उंगलियाँ
स्वप्न आये न फिर जो गए

(मौलिक अवं अप्रकाशित)

Views: 1148

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 5, 2013 at 11:16am

 KISHAN KUMAR जी गीत पसंद करने हेतु आभार|

Comment by Abhinav Arun on August 5, 2013 at 5:37am

प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी
ताका झाकी का मोहताज़ है आदमी 
आयेगा एक दिन
जब सुनेंगे यही
लीक पर्चे सभी हो गए

वाह वाह क्या कहने है राणा भाई शानदार , अद्भुत आपका ये रंग कहीं छुपा हुआ था ..उभर कर सशक्त रूप में आई है रचना ... बार बार पढ़कर आनंदित हूँ ,,,,सुन्दर अति सुन्दर सृजन के लिए साधुवाद !!

Comment by वेदिका on August 4, 2013 at 9:20pm

प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी
ताका झाकी का मोहताज़ है आदमी 
आयेगा एक दिन
जब सुनेंगे यही
लीक पर्चे सभी हो गए

वाह ...प्रश्न पत्र सी जिन्दगी ..बहुत सटीक उपमा, और ताका झांकी के प्रयोग ने तो कमाल का असर पैदा किया है|

मौल श्री से हैं झरते नहीं फूल अब....बिछोह पीड़ा उजागर हुयी  

गुलमोहर के तले है न स्कूल अब....बिडम्बना देखिये की जब गुलमोहर तले स्कूल था, तो हम भवन निर्माण के अनुदान की गुहार लगाते थे, और अब जब भवन में है तो वही गुलमोहर याद आता है| मेरी क्लास जिस चन्दन के पेड़ के तले लगती थी, वह नही रहा, इन्हीं भवन निर्माण के चलते....शुक्रिया आपका, आपने दबी याद में ताजगी भर दी        

 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 4, 2013 at 7:39pm

"प्रश्न पत्रों सी लगने लगी जिंदगी
ताका झाकी का मोहताज़ है आदमी 
आयेगा एक दिन
जब सुनेंगे यही
लीक पर्चे सभी हो गए"..........इन पंक्तियों में वास्तविकता साफ साफ दिखाई देती है,

आदरणीय राणा प्रताप जी, सुंदर व् भावनात्मक रचना , हार्दिक बधाई आपको

Comment by बृजेश नीरज on August 4, 2013 at 6:32pm

वाह! जिस तरह बिम्बों द्वारा जिंदगी की आपाधापी को आपने उकेरा है वह लाजवाब है! बहुत ही सुन्दर गीत! आपको नमन!

Comment by विवेक मिश्र on August 3, 2013 at 4:13pm
/रतजगों की फसल/
/प्रश्नपत्रों सी ज़िन्दगी/
/गुलमोहर के तले स्कूल/
अहा। क्या खूब बिम्ब हैं। बिम्बों का देसीपन ही आपके गीतों की विशेष पहचान है। 'तुलसी के बिरवे' के बाद ये 'चम्पा के फूल' भी बहुत पसन्द आए। बधाई हो बधाई।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 3, 2013 at 4:01pm

मौल श्री से हैं झरते नहीं फूल अब 

गुलमोहर के तले है न स्कूल अब
अब न अठखेलियाँ
चम्पई उंगलियाँ 
स्वप्न आये न फिर जो गए-------ये पंक्तिया बहुत भा रही है |अब ये सब बात आने वाली पीढ़ी कहानियों में ही पढेगी | 

बहुत  सुन्दर भाव रचना के लिए हार्दिक बधाई भाई श्री राणा प्रताप सिंह जी, सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 3, 2013 at 1:30pm

ठेठ बिम्बों का प्रयोग एकदम से मोह गया है.

रतजगों की फसल काटने का अनुभव सही है अचानक नहीं मिल जाता.  उनकी फसलों के लिए पहले उनके बीज बोने की पूरी क़वायद सी होती है. बहुत गहन भाव अपने पूरे बहाव में है.

इसी तरह पर्चों का लीक होजाना और ज़िन्दग़ी का बेमायना होजाना शिद्दत से उभर कर आया है.

या फूल चुनने और बाग़-बगीचे, जिसे बगइचा कहना उचित समझता हूँ, में पेड़ों के नीचे चलते स्कूल बहुत कुछ कहते हैं.

इसीतरह, चम्पई उँगलियों से जो कुछ इंगित है वह बस अनुभव करने की चीज़ है. 

इस भाव-रचना केलिए हार्दिक बधाई.

ऐसा संभव है,  मात्रिकता का निर्वहन कुछ और अनुशासन की अपेक्षा करता दिखे. 

साथ ही यह भी कहूँगा कि यह उतना ही सच है कि ऐसे बिम्ब ज़मीनी रस-रसना  भी माँगते हैं. उस रस से तदनुरूप अभिसिंचित करने का अधिकार रचनाकार का है. पाठक की अपेक्षा वातावरण की अवश्य होती है.

पुनः हार्दिक बधाइयाँ और अनेकानेक शुभकामनाएँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 3, 2013 at 12:13pm

वीनस भाई ..आपको मज़ा आया ..मुझे भी भी आया|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 3, 2013 at 12:13pm

माथुर साहब ..गीत को सराहने के लिए धन्यवाद|

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"चाहतें (लघुकथा) : बार-बार मना करने पर भी 'इच्छा' ने अपनी सहेली 'तमन्ना' को…"
13 minutes ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दूसरा अंक -पत्र'..... तो बी. ए. की परीक्षा आपने दोबारा क्यों पास की? ' इंटरव्यू बोर्ड के…"
1 hour ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रतीक्षा है विषय मुक्त  सार्थक रचनाओं की।"
1 hour ago
रामबली गुप्ता posted a blog post

कर्मवीर

आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं। स्थिति…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर और समसामयिक नवगीत रचा है आपने। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

दोहा पंचक - आचरण

चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान। किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।। * हवा  विषैली  हो …See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई तिलक राज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार। 9, 10…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। कुछ मिसरे और समय चाहते है। इस प्रयास के…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। आ. भाई तिलक राज जी के सुझाव से यह और…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई अजय जी, प्रदत्त मिसरे पर गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" आदरणीय तिलक राज कपूर साहब,  आप मेरी प्रस्तुति तक आये, आपका आभारी हूँ।  // दीदावर का…"
Thursday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service