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गीत की जन्मपत्री बनाते रहे

पीर पंचांग में सिर खपाते रहे ।
गीत की जन्मपत्री बनाते रहे ।
हम सितारों की चौखट पे धरना दिये
स्वप्न की राजधानी सजाते रहे ।

लाख प्रतिबंध पहरे बिठाये गये
शब्द अनुभूतियों के सखा ही रहे
आँसुओं को जरूरत रही इसलिये
दर्द के कांधे के अँगरखा ही रहे
श्वास की बाँसुरी बज उठी जब कभी
हम निगाहें उठाते लजाते रहे।

पर्वतों से मचलती चली आ रही,
गीत गोविन्द मुग्धा नदी गा रही,
पांखुरी-पांखुरी खिल गई रूप की
भोर लहरा रही, चांदनी गा रही,
ये सरित सिंधु तक यौवना जा सके
आस अच्छे दिनों की लगाते रहे ।

धूप खिलती रही, सांझ ढलती रही
उम्र पर लीक ही लीक चलती रही
पनघटों की जगह लग गये कल मगर
रार पनिहारिनों बीच पलती रही
जान ही ना पड़ा बाल कब पक गये
बेखबर बैल हल में मचाते रहे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 3, 2014 at 3:36pm

इस गीत के प्रवाह ने दिल जीत लिया आ० सुलभ अग्निहोत्री जी - वाह।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 9:07pm

आदरणीय, अभी आप इस मंच पर आये हैं. अभी आपको बहुत कुछ ऐसा कुछ जानने और सुनने को मिलेगा जो थोड़ा विशेष लगेगा. किन्तु, उनका होना अनायास नहीं है. आप स्वयं समझदार हैं, मेरे सम्बोधन का आशय और उसमें अंतर्निहित इंगितों को समझियेगा.

सादर

Comment by Sulabh Agnihotri on August 11, 2013 at 6:00pm

वन्दना तिवारी जी ! धन्यवाद !
चैखट दरअसल जो आप समझ रही हैं वही है। मेरा यूनीकोड कन्वर्टर पता नहीं क्यों गलत टाइप कर रहा है।
‘पीर’ नहीं समझ पायीं आप या ‘पंचांग’ नहीं समझ पायीं ?

Comment by Sulabh Agnihotri on August 11, 2013 at 5:53pm

आदरणीय सौरभ जी ! अपना निवेदन पुनः दोहरा रहा हूँ । आपकी अनुशंसा मिली - मेरा रचना-कर्म सार्थक हो गया।

Comment by Vindu Babu on August 11, 2013 at 5:09pm
आदरणीय सुलभ जी बड़ी गहन रचना रची है आपने,कई बार पढनें पर अर्थ स्पष्ट हो पाया मुझे।
'पीर पंचांग' का मतलब महोदय नहीं समझ सकी,'चैखट' तो शायद चौखट होगा।
प्रथम बन्द ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
सादर बधाई इस सार्थक रचना के लिए।
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 3:58pm

आदरणीय सुलभजी, आपकी इस रचना ने बहुत प्रभावित किया है. बार-बार पढ़ गया. सस्वर पढ़ता रहा. दर्द के काँधे अँगरखा होना छू गया.  साथ ही, इन पंक्तियों से आपकी विशेष संवेदनशीलता मुखरित होती है  -- पनघटों की जगह लग गये कल मगर / रार पनिहारिनों बीच पलती रही

सादर बधाइयाँ, आदरणीय. 

Comment by Sulabh Agnihotri on August 7, 2013 at 9:40am

बहुत-बहुत धन्यवाद ! राणा प्रताप सिंह जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 7, 2013 at 9:40am

बहुत-बहुत धन्यवाद ! डाॅ0 प्राची सिंह जी !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 6, 2013 at 10:36pm

बहुत सुन्दर गीत | ठेठ और देशज शब्दों ने गीत को और भी सुन्दर बना दिया है|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 5, 2013 at 10:03pm

बहुत खूबसूरत प्रवाहमय गीत लिखा है आ० सुलभ अग्निहोत्री जी ..हार्दिक बधाई 

कुछ एक टंकण त्रुटियाँ रह गयी हैं उन्हें सुधार लें 

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