Comment
लघुकथा केलिए बधाइयाँ.
कथा का मर्म भेदक है जिसे आपने पकड़ने औरफिर पाठकों से साझा करने का सफल प्रयास किया है. आपकी यह लघुकथा पूर्व के प्रयासों से बहुत संयत है.
सतत प्रयासरत रहें.
शुभेच्छाएँ
भाई बृजेशजी की बातों से मैं सहमत नहीं हो पा रहा हूँ.
भाई विन्ध्येश्वरी जी आपके इस प्रयास पर आपको बधाई!
वैसे आपकी लघुकथा मुझे वीर छंद जैसी लगी। अतिशयोक्ति की भरमार है। बीमा के चार पांच लाख रूपये, मोची के लड़के का भूख से तड़पकर मरना।
सबसे महत्वपूर्ण बात आप जैसे रचनाकार की कलम से बम्बइया चलताऊ भाषा का प्रयोग अटपटा सा लगा।
सादर!
अति मार्मिक लघु कथा ,, सादर बधाई !
आ0 विन्ध्येश्वरी त्रिपाठी जी, वाह..! एक गंभीर सोच, अतिसुन्दर विचारणीय कथानक। हार्दिक बधाई स्वीकारें, सर जी। सादर,
आदरणीय विन्ध्येश्वरी जी बहुत बढ़िया लघु कथा के लिए बधाई ।
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