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सोचने भर से यहाँ कब क्या हुआ

सोचने भर से यहाँ कब क्या हुआ

चल पड़ो फिर हर तरफ रस्ता हुआ

 

जिंदगी तो उम्र भर बिस्मिल रही

मौत आयी तब कही जलसा हुआ

 

रोटियां सब  सेंकने में थे लगे

घर किसीका देखकर जलता हुआ

 

जख्म देकर दूर सब हो जायेंगे

आ मिलेंगे देखकर भरता हुआ

 

चाहिए पत्थर लिए हर हाथ को

इक शजर बस फूलता-फलता हुआ 

               

बिस्मिल = ज़ख्मी 

 

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Dr Lalit Kumar Singh on August 15, 2013 at 6:47am

आदरणीय Saurabh Pandey जी का दिल से शुक्रिया 

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 14, 2013 at 3:01pm

आदरणीय ललितजी, आपकी प्रस्तुत ग़ज़ल दिल से वाहवाहियाँ ले रही है. हर शेर जबर्दस्त हुआ है.

दाद कुबूल कीजिये

सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on August 12, 2013 at 4:07pm

बहुत सुंदर रचना है, सादर

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on August 12, 2013 at 6:46am

सभी आदरणीय मित्रों एवं सुधीजनों का दिल से शुक्रिया 

Comment by विवेक मिश्र on August 12, 2013 at 4:01am
हालांकि ग़ज़ल छोटी है पर हरेक शे'र बेहतरीन हुआ है। दिली दाद कबूल करें ललित जी।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 11, 2013 at 5:15pm

रोटियां सब  सेंकने में थे लगे

घर किसीका देखकर जलता हुआ...........वास्तविकता लिए हुआ , शेर

बधाई आदरणीय डा. ललित जी

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 11, 2013 at 2:27pm

ललित भाई , सीधे साधे सरल शब्दों मे बहुत अच्छी ग़ज़ल कही आपने , बधाई !!

चाहिए पत्थर लिए हर हाथ को

इक शजर बस फूलता-फलता हुआ ---------- वाह !!

Comment by annapurna bajpai on August 11, 2013 at 1:50pm

रोटियां सब  सेंकने में थे लगे

घर किसीका देखकर जलता हुआ........................... एकदम सही बात , पक्का यथार्थ । बहुत बधाई आपको आदरणीय ललित जी ।

Comment by Abhinav Arun on August 11, 2013 at 12:52pm

चाहिए पत्थर लिए हर हाथ को

इक शजर बस फूलता-फलता हुआ 

ati sundar sameecheen ghazal adarneey !! bahut badhai is sashakt kriti ki prastuti hetu .

{slow net pe hindi nahi type ho raha hai so roman me likh raha hoon }

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 11, 2013 at 12:43pm

वाह वाह आदरणीय शानदार ग़ज़ल कही है आपने सभी अशआर पसंद आये खासकर इस अशआर हेतु अधिक दाद कुबूल फरमाएं

जिंदगी तो उम्र भर बिस्मिल रही

मौत आयी तब कही जलसा हुआ वाह वाह

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