ल ला ला ला ल ला ला ला ल ला ला ला ल ला ला
वतन की कौन सोचेगा अगर तुम हम नहीं तो
पहन लो हाथ में चूड़ी अगर हो दम नहीं तो
लुटी है आबरू जिसकी वो बिटिया इस चमन की
वो है जल्लाद गर है आँख किंचित नम नहीं तो
हसी मंजर हसी रुत ये भला किस काम के हैं
सफ़र में साथ जब अपने हसी हमदम नहीं तो
मजा क्या आएगा हम को भला इस जिन्दगी का
खुशी के साथ थोडा सा कहीं गर गम नहीं तो
सुखा देती जिगर के घाव तेरी मुस्कराहट
बदन की चोट हो ना ठीक गर मरहम नहीं तो
मौलिक व अप्रकाशित
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान गोंडा
Comment
ताव, प्रभाव और शिल्प के लिहाज से बेहतर नतीजा आया है, आदरणीय आशुतोषजी.
ढेर सारी बधाई स्वीकारें
शुभम्
वतन की कौन सोचेगा अगर तुम हम नहीं तो
पहन लो हाथ में चूड़ी अगर हो दम नहीं तो
लुटी है आबरू जिसकी वो बिटिया इस चमन की
वो है जल्लाद गर है आँख किंचित नम नहीं तो .... बहुत ही बढिया आदरणीय ..बधाई आपको
बीनस जी आप लोगों से ही चंद महीनात पहले ग़ज़ल के बिषय में जानी का मौका मिला ग़ज़ल की कक्षा और ग़ज़ल की बातें ज्वाइन करके तमाम बातें मालूम हुई ..उसी के आधार पर प्रयास कर रहा हूँ और चाहता हूँ आप सब मार्गदर्शन करते रहे ताकी ग़ज़ल के तमाम तकनीकी बातों की जानकारी मुझे मिल सके ...हार्दिक धन्यवाद के साथ
वाह !!!
बेहतरीन ... हार्दिक बधाई स्वीकारें ....
आपकी लेखनी से लगातार अच्छी रचनाएँ पढ़ कर बेहद खुशी होती है
आदरनीय केतन जी , श्याम जी ..हौसला अफजाई के लिए हार्दिक धन्यवाद
Koshish ke liye bahut mubarak baad
Waah
बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको
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