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फासलों की 

हर पर्त को चीरते 

चंद शब्द...

जिनका चेहरा,

कभी दिखाई ही नहीं देता..

आखिर देखूँ भी तो क्यों ?

लुका छिपी में उलझाते मुखौटे  !

जिनकी आवाज,

कभी सुनायी ही नहीं देती..

आखिर सुनूँ भी तो क्यों ?

कृत्रिमता में गुँथे बंधित अल्फाज़  !

जिनके अर्थ,

कभी बूझने नहीं होते..

आखिर बूझूँ भी तो क्यों ?

सिर्फ भ्रमित करते से दृश्य तात्पर्य !

जबकि,

हृदय गुहा में 

अंकित होते हों..

मुखौटों की कृत्रिमता से 

सदा सर्वदा अस्पृष्ट..

अर्थ की बंदिशों से परे..

ऊर्जित भाव स्पंदन 

अपने अनुगुंजन में 

चिदानन्द संजोये

उसके चंद शब्द !!

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2013 at 12:35pm

रचना की भाव दशा को अनुमोदित करने लिए सादर आभार आ० सुरेन्द्र वर्मा जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2013 at 12:33pm

आदरणीय श्याम जुनेजा जी 

//व्यर्थ से मुक्ति और अर्थ-पूर्ण को संजोने का यह प्रयास ही तो जीवन की कविता है//

अभिव्यक्ति की मूल भावना को स्पर्श कर रचना के सार को एक पंक्ति में प्रस्तुत करने के लिए आपकी हृदय से आभारी हूँ. 

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2013 at 12:30pm

आदरणीय विजय निकोर जी 

रचना का कथ्य सराह उत्साहवर्धन करने के लिए आपका सादर धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2013 at 12:29pm

अभिव्यक्ति सन्निहित मनोभाव आपको पसंद आये और आपका अनुमोदन प्राप्त हुआ यह उत्साहवर्धक है आ० गिरिराज भंडारी जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2013 at 12:27pm

अभिव्यक्ति आपको पसंद आई आ० अभिनव अरुण जी यह मेरे लिए संतोष की बात है 

आपका हादिक आभार 

Comment by Sulabh Agnihotri on August 19, 2013 at 11:19am

बहुत सुन्दर है प्राची जी !

Comment by रविकर on August 19, 2013 at 10:54am

सुन्दर शब्द संयोजन-
खूबसूरत भाव-
आभार आदरेया-

Comment by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on August 19, 2013 at 10:41am

बहुत सुन्दर कविता ... कृतिमता से दूर ह्रदय की आवाज मे शब्दविहीन भावना की महत्ता ... अद्भुत 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 19, 2013 at 8:18am

आदरणीया प्राची जी ..शानदार रचना की इन पंक्तियों ने काफी देर के बाद ही आगे की रचना पढने की इजाजत दी ..,

फासलों की 

हर पर्त को चीरते 

चंद शब्द...वाकई शानदार ..सदर बधाई के साथ 

Comment by विवेक मिश्र on August 18, 2013 at 10:07pm

आदरणीया डॉ. प्राची जी -
इस भाव प्रधान कविता की प्रथम तीन पंक्तियाँ ही अपने आप में एक कविता हैं.

/फासलों की 

हर पर्त को चीरते 

चंद शब्द.../
अनेकानेक बधाई स्वीकार करें.

पुछल्ला :-
/"कुछ अल्फाजों को"/ -  'अल्फ़ाज़' शब्द तो संभवतः 'लफ्ज़' शब्द का बहुवचन है. नहीं? 

कृपया ध्यान दे...

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