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और नहीं कुछ शेष रहे।

मुझे जलाओ पीडानल में, उस सीमा तक,
जिस पर अहंकार मरता है,
अभिमान आहें भरता है,
बाकि न कुछ द्वेष रहे,
और नहीं कुछ शेष रहे।

हे देव ! काट दो बंधन सारे ,
एक नहीं सब होवें प्यारे ,
न इर्ष्या का अवशेष रहे,
और नहीं कुछ शेष रहे।

चिंता छोड़ करें सब चिंतन
सुखमय हो जाए हर जीवन
उन्नति देश करे
और नहीं कुछ शेष रहे।

"मौलिक व अप्रकाशित"

 शब्द्कार : आदित्य  कुमार 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 26, 2013 at 5:35pm

शुभ-शुभ

Comment by Aditya Kumar on August 20, 2013 at 4:59pm

आदरणीय बृजेश नीरज जी आपका हार्दिक धन्यवाद् 

Comment by Aditya Kumar on August 20, 2013 at 4:58pm

आदरणीय विजय मिश्र जी आपका हार्दिक धन्यवाद् 

Comment by Aditya Kumar on August 20, 2013 at 4:57pm

आदरणीय  Dr.Prachi Singh जी आपका हार्दिक धन्यवाद् 

Comment by Aditya Kumar on August 20, 2013 at 4:57pm

आदरणीय annapurna bajpai जी आपका हार्दिक धन्यवाद् 

Comment by annapurna bajpai on August 19, 2013 at 11:08pm

आ० आदित्य जी बहुत सुंदर भाव । शुभकामनायें ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 19, 2013 at 8:12pm

बहुत सुन्दर व उन्नत भावों की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

Comment by विजय मिश्र on August 19, 2013 at 5:25pm
एक सार्थक उद्देश्य निहित सुन्दर काव्य रचना ,हार्दिक बधाई आदित्यजी
Comment by बृजेश नीरज on August 19, 2013 at 1:36pm

बहुत सुन्दर प्रयास! आपको हार्दिक बधाई!

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