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पीछे हट जाने का डर है।

घोर तिमिर है, 
कठिन डगर है, 
आगे का कुछ नहीं सूझता,
पीछे हट जाने का डर है।

मन में इच्छाएं बलशाली 
शोणित में भी वेग प्रबल है,
रोज लड़ रहा हूँ जीवनसे
टूट रहा अब क्यों संबल है

मैंने अपनी राह चुनी है 
दुर्गम, कठिन कंटकों वाली 
जो ऐसी मंजिल तक पहुंचे 
जो लगे मुझे कुछ गौरवशाली

धूल धूसरित रेगिस्तानी हवा के छोंकें 
देते धकेल , आगे बढ़ने से रोकें 
सूखा कंठ, प्राण हैं अटके 
कब पहुंचूंगा निकट भला पनघट के

आगे बढ़ना भी दुष्कर है 
मन में मेरे अगर मगर है 
आगे का कुछ नहीं सूझता,
पीछे हट जाने का डर है।

किन्तु गीता में लिखा हुआ है 
तू फल की चिंता मत करना 
अपना कर्म किये जा राही 
निर्णय तो मुझको है करना

सूरज भी निर्बाध गति से चलता है 
निश्चित ही ये घोर तिमिर छटना है 
और साथ ही छट जाएगी घोर निराशा 
लक्ष्य हांसिल करने की सीढ़ी है आशा

मन में आशा 
और अधरों की प्यास 
इतना निश्चित है 
ले जाएगी मुझे लक्ष्य के पास

घोर तिमिर है, 
कठिन डगर है, 
पीछे मुड़कर नहीं देखना 
पीछे हट जाने का डर है।

"मौलिक व अप्रकाशित"

शब्दकार :  Aditya Kumar 

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Comment by Aditya Kumar on August 22, 2013 at 5:28pm

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय   अरुन शर्मा 'अनन्त'  जी . कृपया त्रुटियों से अवगत अवश्य करवाए ताकि मै सुधार सकूँ  ।  आपका हार्दिक आभार  

Comment by Aditya Kumar on August 22, 2013 at 5:26pm

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय  गीतिका 'वेदिका'  जी . कृपया त्रुटियों से अवगत अवश्य करवाए ताकि मै सुधार सकूँ  

Comment by Aditya Kumar on August 22, 2013 at 5:16pm

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय Abhinav Arun जी 

Comment by Aditya Kumar on August 22, 2013 at 5:15pm

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय गिरिराज भंडारी जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 22, 2013 at 4:03pm

आदित्य भाई , सुन्दर रचना , सुन्दर भाव , अच्छी रचना !! बधाई !!

Comment by Abhinav Arun on August 22, 2013 at 3:15pm

भीड़ से अलग पहचान की रचना है आ. आदित्य जी बहुत बधाई आपको !

Comment by वेदिका on August 22, 2013 at 2:23pm

खूबसूरत भाव समाये रचना में, लेकिन आदरणीय अरुण जी की बात दोहराउंगी, कुछ पंक्तियों तक कविता प्रभावशाली लगी, फिर एकदम से समझ के बाहर| प्रयास करिये! बधाई !! 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 22, 2013 at 12:56pm

आदित्य भाई बेहद सुन्दर प्रयास किया है आपने कुछ पंक्तियाँ बेहद सुन्दर बन पड़ी हैं, आदरणीय केवल भाई जी से मैं भी सहमत कंटक त्रुटियों के साथ साथ प्रवाह भी बाधित लग रहा है कृपया देख लें. बहरहाल इस प्रयास पर बधाई स्वीकारें.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 21, 2013 at 9:44pm

आ0 आदित्य भाई जी,      सूबसूरत रचना, लेकिन कहीं कही टंकण त्रुटि है।कृपया देंख लें।   आपको हृदयतल से बधाई।  सादर,

Comment by Aditya Kumar on August 21, 2013 at 7:09pm

सादर धन्यवाद् आदरणीय  जितेन्द्र 'गीत' जी 

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