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2 1 2 2   1 2 1 2   2 2

आज तेरा पयाम आया है
जैसे फिर माहताब आया है

देख लो सज गये दिवारो दर
घर मेरे कोई शाद आया है

अबके हो फैसला मेरे हक़ में
हांथ में इन्तखाब आया है

इल्म की रौशनी जली मुझमें
यूँ लगा आफ़ताब आया है

हो गये लाख़ रंग हसरत के
मेरा जोड़ा शहाब आया है

पयाम = सन्देश, माहताब = चाँद , शाद = ख़ुशी,
इन्तखाब = चुनाव, आफ़ताब = सूरज, शहाब = सुर्ख लाल रंग

अमित कुमार दुबे मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on August 27, 2013 at 3:30am

मेहनत करें

शुभेच्छाएँ

Comment by राज़ नवादवी on August 26, 2013 at 10:51pm

"प्रयास तो सही है, मगर रदीफ़ और काफिया देख लें. मंच पे उपलब्ध ग़ज़ल की कक्षा से मुफीद हुआ जा सकता है. "

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 26, 2013 at 2:30pm

वाह भाई क्या कहने छोटी छोटी पंक्तियों में मोटी मोटी बातें कह दी आपने बेहद सुन्दर भाई हार्डीक बधाई स्वीकारें.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 25, 2013 at 8:16pm

आ0 अमित भाई जी,  सादर प्रणाम!    बेहद सुन्दर गजल प्रस्तुति के लिए मेरी बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by mrs manjari pandey on August 25, 2013 at 2:11pm

     दुबे जी  पयाम  आा अच्छा लगा . बहुत बहुत बधाई  स्वीकारें

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 25, 2013 at 1:27pm

सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधायी स्वीकारें ..सादर 

Comment by रमेश कुमार चौहान on August 25, 2013 at 10:28am
दुबेजी आपके इस प्रभावी रचना के लिये बधाई
Comment by बृजेश नीरज on August 25, 2013 at 10:03am

बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by अमित वागर्थ on August 25, 2013 at 9:26am

adarniyaa annapurna ji aapka bahut-bahut shukriya

Comment by अमित वागर्थ on August 25, 2013 at 9:22am

aadarniya bhandari ji aapka tahe-dil se shukriya

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