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अमित वागर्थ's Blog (8)

ग़ज़ल -चाँद छुपकर अँधेरों में रोता रहा

212      212    212     212

रात जगता रहा दिन में सोता रहा

चाँद के ही  सरीखे से होता रहा

 

बादलों की हुकूमत हुई चाँद पर

चाँद छुपकर अँधेरों में रोता रहा

 

उल्टे रस्ते ही जब मुझको भाने लगे

बारी बारी से अपनों को खोता रहा

 

रस्म मैंने निभायी नहीं है मगर

दिल में रिश्तों को अपने संजोता रहा

 

जो न मांगा मिला मुझको सौगात में

जिसको चाहा वो मुश्किल से होता रहा

 

मैंने अपने गले से…

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Added by अमित वागर्थ on July 10, 2014 at 10:58am — 30 Comments

ग़ज़ल - बहाने पे बहाना हो रहा है

१२२२    १२२२     १२२

जमाना अब दीवाना हो रहा है

खुदी से ही बेगाना हो रहा है

 

जला डाला था जिसने घर हमारा

वही अब आशियाना हो रहा है

 

जो हमने…

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Added by अमित वागर्थ on May 7, 2014 at 11:00am — 20 Comments

ग़ज़ल - दिले-ग़ालिब कहाँ से लाओगे

आज मजलूम को सताओगे

बददुआ सात जन्म पाओगे

 

बह्र ग़ालिब की खूब लिख डालो

दिले-ग़ालिब कहाँ से लाओगे

 

खुद को भगवान मान  बैठेगा

हद से ज्यादा जो सिर झुकाओगे

 

आज साहब बने हो रैली…

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Added by अमित वागर्थ on February 21, 2014 at 7:02pm — 15 Comments

ग़ज़ल - बज़्म थी तारों की उसमें चाँद का पहरा भी था

२१२२      २१२२      २१२२     २१२

बज़्म थी तारों की उसमें चाँद का पहरा भी था

धूम थी रानाइयों की दिल मेरा तन्हा भी था

 

इक नदी थी नाव भी थी और था मौसम हसीं

साथ तुम थे बाग़ गुल थे इश्क मस्ताना भी था…

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Added by अमित वागर्थ on January 8, 2014 at 7:00pm — 35 Comments

ग़ज़ल -सिर हमारे इल्ज़ाम क्यों

2 1 2 2          2 2 1 2

.

दफ़्तरों में आराम क्यों

फाइलों में है काम क्यों

 

सुरमयी सी इक शाम है

फिर उदासी के नाम क्यों

 

कर गया वो करतूत…

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Added by अमित वागर्थ on December 7, 2013 at 11:00pm — 11 Comments

समन्दर की लहरों सी है जिन्दगानी

1  2 2 1   2 2 1 2   2 1 2 2

समन्दर की लहरों सी है जिन्दगानी
कभी बर्फ गोला कभी बहता पानी

उदासी के बूटे जड़े हैं सभी में
हो तेरी कहानी या मेरी कहानी

बुढ़ापे में होने लगी ताज़पोशी
किसी काम की अब नहीं है जवानी

ये मौजें भी अब मुतमइन सी हैं लगती
नहीं है वो जज्बा नहीं वो रवानी

नये ये नज़ारे बहुत दिलनशीं हैं
मगर मुझको भाती हैं चीज़ें पुरानी

अमित दुबे अंश  मौलिक व अप्रकाशित

Added by अमित वागर्थ on September 30, 2013 at 2:00pm — 14 Comments

आज तेरा पयाम आया है

2 1 2 2   1 2 1 2   2 2



आज तेरा पयाम आया है

जैसे फिर माहताब आया है



देख लो सज गये दिवारो दर

घर मेरे कोई शाद आया है



अबके हो फैसला मेरे हक़ में

हांथ में इन्तखाब आया है



इल्म की रौशनी जली मुझमें

यूँ लगा आफ़ताब आया है



हो गये लाख़ रंग हसरत के

मेरा जोड़ा शहाब आया है

पयाम = सन्देश, माहताब = चाँद , शाद = ख़ुशी,

इन्तखाब = चुनाव, आफ़ताब = सूरज, शहाब = सुर्ख लाल रंग



अमित कुमार दुबे मौलिक व…

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Added by अमित वागर्थ on August 24, 2013 at 8:19pm — 14 Comments

वो जो पास होते

वो जो पास होते कुछ ऐसा यार होता,  
बेताब दिल हमारा खुश बेशुमार होता. 
 
हम हाले-दिल सुनाते बेचैन निगाहों से, 
उनका भी कुछ अपना अंदाज़े-प्यार होता. 
 
एहसास जो हमें है उनको भी काश होता, 
उनको भी मेरी चाहत का इंतज़ार होता. 
 
उनको भी इल्म होता दीवानगी का मेरे, 
दीवानगी पे मेरे उनको खुमार होता. 
 
हम साथ-साथ चलते गिरते कभी संभलते…
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Added by अमित वागर्थ on May 25, 2013 at 6:30pm — 8 Comments

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