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लघुकथा : त्रिया चरित्र (गणेश जी बागी)

ये साहब बहुत ही कड़क और अत्यंत नियमपसंद स्वाभाव के थे ।  कई दिन रेखा देवी की हाजिरी कट गई |  फटकार लगी सो अलग ।

उस दिन साहब के चैम्बर से तेज आवाज़ें आ रही थीं । रेखा देवी चीखे जा रही थीं, "ये साहब मेरी इज़्ज़त पर हाथ डाल रहा है.."
सब देख रहे थे, ब्लाउज फटा हुआ था । साहब भी भौचक थे । उनकी साहबगिरी और बोलती दोनो बंद थी |


साहब संयत हुए और बोले, "जाओ रेखा देवी.. जब आना हो कार्यालय आना और जब जाना हो जाना, आज से मैं तुम्हें कुछ नही कहनेवाला । वेतन भी पहले जैसा समय से मिलता रहेगा ।.."
मामला सुलझ गया था । रेखा देवी जीत के भाव के साथ चैम्बर से बाहर निकल रही थीं |

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 1, 2013 at 7:14pm

मान प्रतिष्ठा का भय तो सताता ही है | सौ फीसदी तो पुरुष वर्ग भी गलत नहीं है | ऐसा ही वाकिया अग्रवाल कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल के साथ भी घटित हुआ, जिनकी सज्जनता से सब वाकिफ थे | कहानी एक सच्चाई को  बयान करने में सफल रही है 

इसके लिए हार्दिक बधाई आदरणीय श्री गणेश जी बागी जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 5:57pm

आदरणीय गणेश जी 

महिलाओं का घर की दहलीज़ पार कर बाहर नौकरी करना समाज में कभी भी सुरक्षित नहीं रहा.. जिसके लिए कई कई नियम क़ानून बनाए गए.. 

पर महिलाओं द्वारा बेख़ौफ़ हो उनकी आड़ में ऐसा दुर्-आचरण  अफसरों व सहकर्मी पुरुषों के लिए कितना भारी पढ़ सकता है यह एक चिंता का विषय है...

इस पर कलम रखती सत्य घटना पर आधारित प्रस्तुति के लिए बधाई

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 1, 2013 at 4:30pm

आपके कार्यालय में हुई  ’उस’ घटना को आपने बहुत ही गंभीरता से कथा-प्रारूप दिया है, गणेशभाईजी.

आपकी इस लघुकथा के नेपथ्य का मैं जानकार रहा हूँ, अतः इस कथा को एक अलग ढंग से पढ़ पा रहा हूँ.

शिल्पगत गंभीरता के लिए आपको हृदय से बधाई.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 1, 2013 at 4:16pm

//is vishay par lagbhag aisi hi laghukatha likhi ja chuki hai, jahan tak mujhe yaad hai aap use laghukatha.com par dekh sakte hain. //

//ab tak padhi hazaron laghukathaaon me kaun si kahan se padhi aur kis lekhak ki thi yah sunishchit hokar kahna bade dimaagwaalon ke liye hi sambhav hai, mere liye thoda mushqil hai //

फिर मेरे को क्यों समुद्र में गोते लगवा रहे हो भाई :-)))))))))


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 1, 2013 at 3:11pm

दीपक भाई, यदि पहले से लिखी किसी लघु कथा से यह कथा टकराती है तो यह संयोग ही होगा, यदि लघुकथा का लिंक आप मुझे मेल कर दें तो अति कृपा होगी, यदि सचमुच दोनों लघुकथाओं में समानता होगी तो यह पोस्ट मैं हटा दूंगा । बताना चाहूँगा कि यह लघुकथा यथार्थ की धरातल पर है । 

भाई मैंने विषय कभी ढूंढा ही नहीं, बल्कि विषय स्वतः मिलते रहते हैं और कथाएं जन्म लेती रहती हैं । 

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on September 1, 2013 at 2:03pm

गंभीर विमर्श की धरातल पर खड़ी एक सशक्त लघुकथा के लिए सादर बधाई स्वीकारें आ बागी भाई जी.....

Comment by मोहन बेगोवाल on September 1, 2013 at 1:48pm

 आदरनीय गणेश जी , आप जी लघुकथा बहुत ही खास तरह की समाज में पनप रही मानसिकता की तरफ इशारा करती हे , वो भी समय था जब ऐसी घटना हमारे गावों में होती थी, तो वो पीड़ी  दर पीड़ी साथ नहीं छोडती थी 

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 1, 2013 at 12:15pm

आदरणीय भ्राताश्री जय हो , क्या तथ्य उजागर किया है आपने मानसिकता में इतना परिवर्तन हो गया है ऐसी घटनाएँ होने लगी हैं, सोच इतनी गिर चुकी है अधिकतर लोग उपाय की तलाश में रहते हैं कि काश कुछ ऐसा हो जाये कुछ करना भी न पड़े और काम भी बन जाए. हृदयतल से ढेरों ढेरों बधाई स्वीकारें इस लघुकथा पर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 1, 2013 at 11:18am

आदरणीय गणेश भाई !! बहुत अच्छी लघु कथा !!! हार्दिक बधाई !! आज मर्दों के लिये ये ज्वलंत समस्या है , नये कानून ने समस्या और भी गम्भीर कर दी है ! कानून के दुर उपयोग की सभावना बहुत बढ़ गई है !!

Comment by Shubhranshu Pandey on September 1, 2013 at 10:50am

आदरणीय गणॆश भैया. मेरे एक मित्र के पिता जी के साथ ऎसा ही हुआ था और वो मरते समय तक अदालत से इस केस को लड़ते रहे.....हालात बस ये ही थे..

पहले किसी की इज्जत जाना को सबसे बुरा माना जाता था, लेकिन आज कल है कि,.... बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा.....ये समस्या पूर्ति का साधन हो गया है. 

ये समस्या अब घर बाहर सभी जगह देखने को मिलने लगी है. झूठे आरोप लगाने वाले  ऎसा ही सोचते हैं कि लोगों की यादाश्त छोटी होती है कुछ दिनों में भूल जायेंगे... इज्जत का क्या है? कौन सा खाना दे रहा है? अब वो जंजीर फ़िल्म का शेरखान नहीं है जो उधार लेने के लिये अपने मूँछ की बाल का सौदा करता था...

सुन्दर कथा..बधाई.

सादर

 

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