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पांच दोहे

 

खुद के अन्दर झाँक के, पढ़  ले तू आलेख

अपने ऐसे हाल का,  खुद  खींचा  आरेख

 

बाहर पानी से बुझे, कण्ठ लगी जो प्यास

भीतर जी मे जो लगी,कौन बुझाये प्यास

 

पंछी घर को लौटते, साँझ लगी गहराय

रे मन चल लग ठौर से,तू काहे पछुवाय

 

अन्धियारी में जुँ रहे, दीपक ही की खोज

अपने अन्दर खोजना, अपना सुख तू रोज   

 

बंद आँख कर देखिये,त्रितिय आँख की ओर

ध्यान सरलता से करें,तनिक न दीजे जोर

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 3, 2013 at 12:02am

 सुंदर संदेशप्रद दोहों पर बधाई आदरणीय गिरिराज जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2013 at 10:28pm

रमेश भाई , उत्साह वर्धन के लिये शुक्रिया !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2013 at 10:27pm

आदरणीया डा. प्राची जी , मै तो डर रहा था , पहली बार दोहा प्रयास लिया , और डरते 2 आपके कमेण्त की राह देख रहा था !! सराहना के लिये बहुत आभार !!

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 2, 2013 at 10:01pm
गिरीराज भंडारी के, सुंदर पांच दोहे ।
बढिया है ज्ञानवर्घक, सभी को ले मोहे ।।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 2, 2013 at 9:57pm

आदरणीय गिगिराज भंडारी जी 

आत्मान्वेषण की भूमि पर बहुत सुन्दर दोहावली प्रस्तुत की है 

यह दोहा खास तौर पर बहुत पसंद आया ...

बाहर पानी से बुझे, कण्ठ लगी जो प्यास

भीतर जी मे जो लगी,कौन बुझाये प्यास............ भीतर जी ..वाह ! अपने आत्मस्वरुप को यह सम्मान देना मुग्ध कर गया 

बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2013 at 9:44pm

आदरणीय केवल भाई , आपका बहुत बहुत आभार !! अगर आप -"संप्रेषण" को मुझे समझा सके तो आभारी रहूंगा !!इसका क्या तातपर्य है , अगर उदाहरण दे सके तो और भी अच्छा !! मुझे आप शून्य ही समझ कर समझायें ! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2013 at 9:34pm

आदरणीय गणेश भाई , आपकी सराहना निश्चित मेरे लिये उत्साह वर्धन का कारक है !! बहुत बहुत आभार !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2013 at 9:28pm

श्याम भाई , स्व. दुश्यंत कुमार जी की गज़ल की चार  लाइनें सहसा याद आ गईं --

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चहिये ,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये !!

मेरे सीने मे नही तो तेरे सीने मे सही

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2013 at 9:22pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी , दोहों की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत आभार !!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 2, 2013 at 9:19pm

आदरणीय भंडारी साहब, सभी दोहें अच्छे लगें, बहुत बहुत बधाई । 

कृपया ध्यान दे...

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