For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

घुट-घुट के जीना सीख लिया

रिश्तों की मर्यादा में हमने घुट-घुट के जीना सीख लिया,

औरों को खुशियाँ देने को, छुप-छुप के रोना सीख लिया।

 

ताने उलाहने सुन कर हम बने रहे हर बार अंजान,

वो यूं ही सताते रहे हमे समझा न कभी हमे इंसान।

मेरी आंखो के सागर का बूंद-बूंद तक लूट लिया और,

रिश्तों की मर्यादा में हमने घुट-घुट के जीना सीख लिया।

 

मेरे मन की गहराई मे अब उलझनों का घेरा हैं

हर रात बीते रुसवाई मे, बेबस हर सवेरा है।

मौसम की कड़ी तपन मे घावों को सीना सीख लिया और

रिश्तों की मर्यादा में हमने घुट-घुट के जीना सीख लिया।

 

ठोकर खाकर देखा चारो तरफ हैं स्वार्थ की धुंध,

खामोशी से सहकर सबकुछ आंखे अपनी करली बंद,

मेरा ही मन जाने है क्या-क्या मुझपर बीत गया और

रिश्तों की मर्यादा में हमने घुट-घुट के जीना सीख लिया। 

- वसुधा निगम 

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

Views: 1087

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 6, 2013 at 2:46pm

एक स्त्री कई बातें अपने अंदर ही समेटे घुटती रहती है.. उस वेदना को प्रस्तुत करती अभिव्यक्ति..

कथ्य यद्यपि प्रभावी है फिर भी व्याकरण और शिल्प काफी समय और चाहता है 

प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by Vasudha Nigam on September 5, 2013 at 10:08am

आभार आप सभी का, मार्गदर्शन देते रहिएगा, लिखने की प्रेरणा मिलती है।

 आदरणीय राजेश झा जी,

आपका संशय दूर करने का प्रयत्न कर रही हूँ,

1  (रिश्तों की मर्यादा में हमने घुट-घुट के जीना सीख लिया) इस रचना के जरिये एक नारी की व्यथा बताने की कोशिश की है,और मेरे अनुसार मर्यादा यदि अभिव्यक्ति का अधिकार न दे तो घुटन बन जाती है। 

2  (मेरी आंखो के सागर का बूंद-बूंद तक लूट लिया) इतना रोये की आँसू सूख गए। 

3  (ठोकर खाकर देखा चारो तरफ हैं स्वार्थ की धुंध) नारी का मासूम मन ठोकर खाकर ही स्वार्थ को समझ पाता हैं। 

ये रचना एक स्त्री की निराशा को व्यक्त कर रही है अतः नकारात्मक है, रचना ने आपको निराश किया क्षमा चाहुंगी।

 

 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 5, 2013 at 3:16am

सुंदर रचना प्रस्तुति पर,हार्दिक बधाई आदरणीया वसुधा जी

Comment by बृजेश नीरज on September 4, 2013 at 7:15pm

अच्छा प्रयास है। आपको हार्दिक बधाई!

Comment by राजेश 'मृदु' on September 4, 2013 at 5:45pm

आपकी रचना सुंदर है, कुछ बातों पर संशय है कृपया दूर करने की कृपा करें

1 रिश्तों की मर्यादा में हमने घुट-घुट के जीना सीख लिया - मर्यादा शब्‍द नकारात्‍मक अर्थ में प्रयुक्‍त हुआ सा लगता है क्‍योंकि मर्यादा घुटन नहीं देती

2 मेरी आंखो के सागर का बूंद-बूंद तक लूट लिया - यानि आंसू खत्‍म कर दिए या फिर खुशिया खत्‍म कर दीं इन दोनों में क्‍या यहां भी आंखों का सागर नकारात्‍मक तरीके से इस्‍तेमाल हुआ सा लगता है ।

3 ठोकर खाकर देखा चारो तरफ हैं स्वार्थ की धुंध - स्‍वार्थ की धुंध को देखने के लिए ठोकर खाने की आवश्‍यकता कुछ फिट नहीं बैठ रही

हो सकता है मैं अलग तरीके से सोच रहा हूं, पर आपके विचार इन तीन बिंदुओं पर जानना चाहूंगा, सादर

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 4, 2013 at 5:01pm

 विवशता से ही कविता का जन्म हुआ,  वसुधाजी बधाई॥  हर तीसरी पंक्ति में "और" की आवश्यकता नहीं॥

Comment by रविकर on September 4, 2013 at 4:34pm

औरों को खुशियाँ देने को, छुप-छुप के रोना सीख लिया।
4+2+4+4+2= 16            2+2+2+4+3+3 =16


सुन्दर पंक्तियाँ-
बढ़िया भाव-
शुभकामनायें आदरेया-

अगर सभी में ऐसा हो तो, मजा हमारा दुगुना होवे |
सोलह सोलह गिनती कर लें, लय सुर ताल कभी ना खोवे-
सादर

Comment by vijay nikore on September 4, 2013 at 1:04pm

अति सुन्दर भावाभिव्यक्ति। बधाई।

सादर,

विजय निकोर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 4, 2013 at 12:21pm
आदरणीय वसुधा जी ,नारी की विवशता का अच्छा चित्रण किया आपने , बधाई !!
Comment by बसंत नेमा on September 4, 2013 at 11:21am

बहुत सुन्दर रचना .. बधाई वसुधा जी 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
6 hours ago
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
yesterday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
yesterday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो…"
yesterday
आशीष यादव posted a blog post

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे…See More
yesterday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday
आशीष यादव commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"एक बेहतरीन ग़ज़ल रचा है आपने। बिलकुल सामयिक।  इस बढ़िया रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday
आशीष यादव commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"सदियों से मनुष्य प्रकृति का शोषण करता रहा है, जिसे विकास समझता रहा है वह विनास की एक एक सीढ़ी…"
yesterday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .अधर
"वाह। "
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service