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एकाकी, एकाकी
जीवन है एकाकी...
मैं भी हूँ एकाकी,
तू भी है एकाकी,
जीवन पथ पर चलना है
हम सबको एकाकी I
 

ना कोई तेरा है,
ना है किसी का तू,
मोह-माया के फेरे में
जीवत्व है एकाकी I

 

आया तू अकेला था,
जाएगा भी अकेला ही,
आने-जाने के इस क्रम में
होना है एकाकी I
 

संसार के मेले में,
भ्रमों का रेला है,
बहने की है नियती
जड़ को तो बहना है,
स्मरण मगर रख ले
चेतन ये एकाकी I

 

ये तन है क्षण भन्गुर,
पल में मिट जाएगा,
माटी का है ढेला ये,
माटी में ही मिल जाएगा,
तन के इस सुख-दुख में
खुद को रख एकाकी I

 

लाया ना संग कुछ भी,
जाना भी है खाली हाथ,
कर्मों का इक लेखा
होगा बस तेरे साथ,
द्वार पर परमात्मा के
हर आत्मा है एकाकी I

 

एकाकी, एकाकी
जीवन है एकाकी...

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Comment

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Comment by Veerendra Jain on January 20, 2011 at 3:35pm
Ashish ji...aapne mera hausla badhaya..iske liye bahut dhanyawad...
Comment by आशीष यादव on January 20, 2011 at 11:04am
जीवन के अंतिम सत्य से अवगत कराती है यह रचना| बहुत सुन्दर, खुद आचार्य जी ने भी कहा है|
Comment by Veerendra Jain on December 30, 2010 at 4:48pm
Yograj ji....bahut bahut shukriya hausla afzai ke liye...

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 30, 2010 at 2:59pm
इस कविता का सूफियाना अंदाज़ दिल को छू लेने वाला है वीरेन्द्र भाई - साधुवाद !
Comment by Veerendra Jain on December 27, 2010 at 12:19pm
बिल्कुल सही कहा आपने नवीन भैया, आचार्य जी ने रचना पढ़ ली एवम् मार्गदर्शन भी कर दिया , यही बहुत है मेरे लिए... और उनके समझाने का ढंग अदभुत है...नमन है उनको...
नवीन भैया... आपने रचना सराही...इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद...आप लोगों का प्रोत्साहन आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है..
Comment by Veerendra Jain on December 27, 2010 at 12:07pm

आचार्य जी... आपने मेरी रचना पढ़ी एवम् मार्गदर्शन किया इसके लिए हार्दिक आभारी हूँ आपका...
आप जैसा कह रहे हैं कि चोला के स्थान पर "लेखा" हो, यही उचित है...चोला शब्द अनुचित ही प्रतीत हो रहा है...मुझे सुधारने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..
सलिल जी....सामाजिक जीवन को लेकर मेरा सोचना ये था कि सामाजिक दायित्वों का वहन तो हमें करना ही है किंतु, इन सबमे  आत्मा को एकाकी रखा जाए, इसलिए मैने ये पंक्तियाँ लिखने की कोशिश की..

बहने की है नियती
जड़ को तो बहना है,
स्मरण मगर रख ले
चेतन ये एकाकी I
कृपया मेरी ये शंका दूर करें एवम् कोई त्रुटि हो तो मुझे अवश्य अवगत कराएँ जिससे मैं स्वयं को सुधार सकूँ...
धन्यवाद...

Comment by Veerendra Jain on December 27, 2010 at 11:54am
Neelam ji...hardik aabhar...
Comment by Veerendra Jain on December 27, 2010 at 11:53am
Zirvi sahab.. bahut bahut shukriya..
Comment by Veerendra Jain on December 27, 2010 at 11:52am
Ganesh ji... rachna pasand karne aur hausla badhane ke liye bahut bahut aabhar..
Comment by Neelam Upadhyaya on December 27, 2010 at 10:41am

लाया ना संग कुछ भी,
जाना भी है खाली हाथ,
कर्मों का इक चोला
होगा बस तेरे साथ,
द्वार पर परमात्मा के
हर आत्मा है एकाकी I

 

जी,  यही जीवन का सत्य है । बहुत सुन्दर । यथार्थ को प्रदर्शित करती अइस कविता के लिए बहुत बधाई ।

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