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श्रांत मन का एक कोना शांत मधुवन छाँव माँगे...

श्रांत मन का एक कोना शांत मधुवन-छाँव मांगे।

सरल मन की देहरी पर
हुये पाहुन सजल सपने,
प्रीति सुंदर रूप धरती,
दोस्त-दुश्मन सभी अपने,
भ्रमित है मन, झूठ-जग में सहज पथ के गाँव माँगे।

कई मौसम, रंग देखे
घटा, सावन, धूप, छाया,
कड़ी दुपहर, कृष्ण-रातें,
दुख-घनेरे, भोग, माया।
क्लांत है जीवन-पथिक यह, राह तरुवर-छाँव मांगे।

भोर का यह आस-पंछी
सांझ होते खो न जाये,
किलकता जीवन कहीं फिर
रैन-शैया सो न जाये।
घेर लेती जब निराशा हृदय व्याकुल ठाँव माँगे।

श्रांत मन का एक कोना शांत मधुबन-छाँव मांगे।

(मौलिक व अप्रकाशित) 

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Comment by Meena Pathak on September 5, 2013 at 9:13pm

बहुत सुन्दर प्रस्तुति .. बधाई स्वीकारें

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 5, 2013 at 8:16pm

कई मौसम, रंग देखे
घटा, सावन, धूप, छाया,
कड़ी दुपहर, कृष्ण-रातें,
दुख-घनेरे, भोग, माया।
क्लांत है जीवन-पथिक यह, राह तरुवर-छाँव मांगे।.......अनुपम सुंदर भाव ली हुयी पंक्तियाँ

वाह! बेहद सुंदर रचना , बहुत बहुत बधाई आदरणीया मानोशी जी

Comment by ram shiromani pathak on September 5, 2013 at 8:06pm

भोर का यह आस-पंछी 
सांझ होते खो न जाये,
किलकता जीवन कहीं फिर
रैन-शैया सो न जाये। 
घेर लेती जब निराशा हृदय व्याकुल ठाँव माँगे।

श्रांत मन का एक कोना शांत मधुबन-छाँव मांगे।/////////अनुपम पंक्तियाँ  

बहुत ही सुंदर रचना आदरणीया मानोशी जी हार्दिक बधाई आपको //सादर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 5, 2013 at 8:05pm

आ0 मानोशी जी,   सादर प्रणाम!    वाह!  अप्रतिम गीत....बहुत खूब।   इन सुन्दर भावों में दिेए गए स्वरूप को सादर नमन! आपकी रचना पर टिप्पणी  करने पर मुझे गर्व है। इस प्रस्तुति हेतु आपको बहुत बहुत शुभकामनाओं  सहित हार्दिक बधाई।   सादर, 

Comment by बृजेश नीरज on September 5, 2013 at 7:05pm

आदरणीया मानोशी जी,

‘उन्मेष’ के गीतों को पढ़कर जो अनुभूति हुई थी फिर ताजा हो गयी। आपके गीत वास्तव में इतनी मधुरता और सहजता से अंतस में उतरते हैं कि बस उसकी लय में पाठक रमता चला जाता है।

इस सुंदर गीत के लिए आपको हार्दिक बधाई।

Comment by राजेश 'मृदु' on September 5, 2013 at 6:24pm

वाह-वाह आदरेया, मन प्रसन्‍न हो गया इस सुंदर रचना को पढ़कर । बहुत बधाई, सादर

Comment by Manoshi Chatterjee on September 5, 2013 at 4:58pm

धन्यवाद श्याम जी, अन्नपूर्णा जी, रविकर जी, गिरिराज जी। आप सब को यह रचना अच्छी लगी, यह मेरे लिये पुरस्कार समान है। 

Comment by Shyam Narain Verma on September 5, 2013 at 4:35pm

 इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ....

Comment by annapurna bajpai on September 5, 2013 at 12:47pm

अनुपम ! अनुपम ! क्या लिखूँ और शब्द ही नहीं है आ० मनोशी जी । 

Comment by रविकर on September 5, 2013 at 11:41am

श्रेष्ठ रचना-
सादर आभार आदरेया
कृपया दूसरे छंद में इन्हें आजमायें-

अनुभाव माँगे =सामर्थ्य माँगे
पाँव माँगे =
दाँव माँगे-

कृपया ध्यान दे...

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