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पीछे मुड़ के नहीं देखना

जाने क्या क्या लोग कहेंगे , किस किस को समझाओगे ,
जिसको वफ़ा समझते हो, उस गलती पर पछताओगे ।

हँसते चेहरे ,सुंदर चेहरे , कितने भोले - भाले चेहरे ,
इस तिलिस्म में पड़े अगर तो , बाहर न आ पाओगे ।

आसमान  में  उड़ो  परिंदे , पंखों पर विश्वास करो ,
इस से ज्यादा खिली धूप और खुली हवा कब पाओगे ।

भींगी पलकें , उतरे चेहरे , वो सपनो का गाँव , गली ,
पीछे  मुड़  के नहीं  देखना, पत्थर  के  हो  जाओगे ।

चलो उठो दो चार कदम ही , उस सागर की ओर बढ़ो ,
शबनम के कतरों को पी कर , कब   तक प्यास बुझाओगे।

फूलों की  शोखी है तुम में , ये  तो हमने  मान लिया ,
फूलों के काँटों की फितरत ,अब किस दिन दिखलाओगे ।

चलो तुम्हारा नाम न लेंगे , गज़लों में अशआरों में ,
लेकिन जब हम तनहा होंगे , तब तुम याद तो आओगे ।

बादल, बरखा , जाड़ा, गरमी , आँसू, यादें, दिन और रात ,
सब आते रहते हैं लेकिन , तुम  जाने  कब आओगे ।

'शेखर' जब जब याद करेगा, तुम भी रह ना पाओगे ,
दिल में धड़कन और आँखों में आंसू बन कर आओगे| 

मौलिक एवं अप्रकाशित

अरविन्द भटनागर ' शेखर'

Views: 854

Comment

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Comment by Anil Chauhan '' Veer" on September 11, 2013 at 9:36pm

आदरणीय शेखर जी हार्दिक  बधाई बेहद खूबसूरत ग़ज़ल … मंत्रमुग्ध कर दिया 

Comment by ARVIND BHATNAGAR on September 11, 2013 at 9:11pm

मुझे ख़ुशी है की आप सब ने इसे पसंद किया । बहुत बहुत धन्यवाद् ।
अरविन्द भटनागर 'शेखर'

Comment by ram shiromani pathak on September 11, 2013 at 8:36pm

आदरणीय अरविन्द जी ,बहुत ही सुन्दर गजल बधाई आपको//


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 11, 2013 at 4:44pm

आदरणीय अरविन्द भटनागर जी 

गज़ल की हर पंक्ति नें हर शेर नें बाँध लिया..बहुत बहुत सुन्दर 

जिस नजाकत से, सहजता से, मासूमियत से इसे लिखा गया है.. उसके लिए बहुत बहुत बधाई 

आसमान  में  उड़ो  परिंदे , पंखों पर विश्वास करो ,
इस से ज्यादा खिली धूप और खुली हवा कब पाओगे ।...वाह! वाह ! 

हर शब्द सीधे हृदय को छू रहा है 

शुभकामनाएँ 

Comment by annapurna bajpai on September 10, 2013 at 10:15pm
खूबसूरत गजल बधाई आपको आ0 शेखर जी ।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 10, 2013 at 8:24pm

बहुत ही सुन्दर रचना!

Comment by Parveen Malik on September 10, 2013 at 7:13pm
आशावादी सोच लिए खूबसूरत गजल आदरणीय.... बधाई !
Comment by rajveer singh chouhan on September 10, 2013 at 3:32pm


चलो तुम्हारा नाम न लेंगे , गज़लों में अशआरों में ,
लेकिन जब हम तनहा होंगे , तब तुम याद तो आओगे | अतिसुन्दर

Comment by vijayashree on September 10, 2013 at 1:19pm

आसमान  में  उड़ो  परिंदे , पंखों पर विश्वास करो ,
इस से ज्यादा खिली धूप और खुली हवा कब पाओगे । ........बहुत खूब 

चलो उठो दो चार कदम ही , उस सागर की ओर बढ़ो , 
शबनम के कतरों को पी कर , कब   तक प्यास बुझाओगे।.......आशावादी सोच 

बधाई स्वीकारें अरविन्द भटनागर जी 

Comment by रविकर on September 10, 2013 at 11:33am

बढ़िया प्रस्तुति-
आँखों को यदि आँख कर ले तो प्रवाह बाधित नहीं होगा /
शायद

आभार आदरणीय-

कृपया ध्यान दे...

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