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रहा स्वयं ही ठूस, भरे घर रविकर-ऐंड़ा

ऐंड़ा पेड़ा खाय लें, लेढ़ा जूठन खात |
टेढ़े-मेढ़े साथ में, टेढ़े-टेढ़े जात |


टेढ़े-टेढ़े जात, जात में पूछ बढ़ाये |
खेड़े बेड़े नात, मात त्यौरियाँ चढ़ाए |


टाँय टाँय पर फुस्स, कहीं कुछ नहीं निबेड़ा |
रहा स्वयं ही ठूस, भरे घर रविकर-ऐंड़ा ||

मौलिक / अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 12, 2013 at 12:50pm

यह भी खूब रही. बधाई आदरणीय

:-)))

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 12, 2013 at 12:05pm

बहुत सुन्दर कुंडलिया छंद रचना सुन्दर शब्द संयोजन के साथ | बधाई रविकर भाई -

जाती-भेद नहीं रखे, क्यों टेडा  हो जात,

जात-पात से हो रहा, बहुत कुठारा घात |

बहुत कुठारा घात, देश न आगे  बढ़ सके

कहते कडवा सत्य, जातियां नहीं सह सके

लक्ष्मण की यह बात, माने अब भली भाँती 

सत्य इसे ही मान, प्रगति रोके ये  जाती |- लक्ष्मण 

  

Comment by रविकर on September 12, 2013 at 9:16am

आभार आदरणीय-
आप सभी का बहुत बहुत आभार ||

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 11, 2013 at 11:01pm

आदरणीय रविकर सर जी कुण्डलिया छंद में आपका जवाब नहीं बेहतरीन कुण्डलिया हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Anil Chauhan '' Veer" on September 11, 2013 at 9:21pm

टाँय टाँय पर फुस्स, कहीं कुछ नहीं निबेड़ा,
रहा स्वयं ही ठूस, भरे घर रविकर-ऐंड़ा .....  आदरणीय रविकर जी हार्दिक  बधाई .... इन पंक्तियों ने हास्य के साथ नमी भी प्रदान की ...  आभार.... 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 11, 2013 at 2:51pm
आदरणीय रविकर जी , बहुत अच्छी कुन्डलिया , जवाब नहीं !!! बधाई !!
Comment by विजय मिश्र on September 11, 2013 at 12:46pm
वाह वाह रविकरजी . -ऐंड़ौ की लूट कथा का अद्भुत न्यायोचित वर्णन तथा लेंढों की मार्मिक पीड़ा भी दास्ताँ भी . सत्य सदैव सुंदर नहीं होता मगर यह कुरूपता असह्य है .

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