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नींद कहीं फिर आ ना जाए , डर लगता है,

ख्वाब वही फिर आ ना जाए, डर लगता है ।

सावन सा वो बरस रहा है मन आँगन में ,
मौसम कहीं बदल ना जाए, डर लगता है ।

ज़हर है कितना इंसानों के दिल दिमाग में,
सांप कहीं वो बन ना जायें , डर लगता है ।

नक्श हैं कितनी चिंताओं के, उस चेहरे पर ,
सूरत कहीं बदल ना जाए, डर लगता है ।

कितना भोलापन है उसकी बातों में फिर भी ' शेखर',
दिल ले कर वो मुकर ना जाए , डर लगता है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित 
अरविन्द भटनागर ' शेखर'

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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on September 14, 2013 at 10:51pm

सुन्दर रचना शेखर भाई जी प्रयास अच्छा है तनिक कोशिश और करते तो ग़ज़ल बन सकती थी. खैर इस रचना पर बधाई स्वीकारें.

Comment by vijayashree on September 14, 2013 at 6:40pm

किसी अपने से बिछुड़ने का डर हमेशा ही आज के परिवेश को देखकर 

मन में समाया रहता है इन भावों को बहुत खूबसूरती से शब्दों में ढाला है 

बधाई स्वीकारें अरविन्द भटनागर जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 14, 2013 at 1:09pm

सावन सा वो बरस रहा है मन आँगन में ,
मौसम कहीं बदल ना जाए, डर लगता है ..बेहतरीन ..सावन की बात ही कुछ और है ..हार्दिक बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 14, 2013 at 11:29am

सुंदर रचना ,बहुत बहुत बधाई आदरणीय अरविन्द जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 13, 2013 at 11:23pm

आदरणीय गणेश भाई आपने सही कहा !! अफसोस है हमारी नज़र नही देख सकी !!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 13, 2013 at 10:49pm

दोस्तों, आप सभी जिस रचना को ग़ज़ल कह टिप्पणी दे रहें हैं वह वस्तुतः ग़ज़ल है ही नही, आप सब एक बार मतला देख कर रदिफ़ काफिया का निर्धारण करें, आप खुद समझ जाएँगे, मैं क्यों कह रहा हूँ, हाँ या रचना ग़ज़ल हो सकती थी, गर लेखक ने ध्यान दिया होता | 

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on September 13, 2013 at 10:07pm

22   22  21    2 2    2 2     2 2  

नींद कहीं फिर आ ना जाए , डर लगता है,-- ‘ना’ शब्दकोष में कोई शब्द नहीं है. ऐसी त्रुटियों से बचें  
ख्वाब वही फिर आ ना जाए, डर लगता है ।

सावन सा वो बरस रहा है मन आँगन में ,
मौसम कहीं बदल ना जाए, डर लगता है ।

ज़हर है कितना इंसानों के दिल दिमाग में,
सांप कहीं वो बन ना जायें , डर लगता है ।

नक्श हैं कितनी चिंताओं के, उस चेहरे पर ,
सूरत कहीं बदल ना जाए, डर लगता है ।

कितना भोलापन है उसकी बातों में फिर भी ' शेखर', -- बहर से खारिज है

दिल ले कर वो मुकर ना जाए , डर लगता है ।

प्रयास  अच्छा है, ख्याल अच्छा है. इसलिए ये नज़्म अच्छा है. भावपूर्ण है 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 13, 2013 at 9:23pm

एक नपी तुली और सधी हुयी ग़जल, बहुत ही बढ़िया 

Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 6:56pm

बहुत ही सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 13, 2013 at 4:35pm

बहुत बढ़िया अरविंद जी आपकी इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई,

कृपया ध्यान दे...

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