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तान्या : महसूस किया तुमको

इन मौन चट्टानों के सामने खड़ा
यह सोचता हूँ ,
कितनी कठोर हैं ये /
जितनी कठोर लगती हैं
क्या उतनी ही?
या कहीं ज्यादा ?
क्या भेद सकेगा कोई इनको?
और फिर मैं देखता हूँ
आकाश की ओर /
बदली छाई है ,
धूप का कतरा नहीं है ।

और फिर क्या देखता हूँ
तोड़ कर प्रस्तर कवच को ,
मोतियों सा झर रहा है ,
दुधिया झरना ।

भूल जाता हूँ मैं 
कि
कितने कठोर हैं ये पाषाण खंड ,
कि
मैं इन्हें भेद नहीं सकूँगा ,
कि
बदली है / धुप का कतरा नहीं है ।

याद रह जाता है
मृदु हास्य करता
वो झरना / छलछलाता
वो शीतलता , तरलता
वो सिहरन / अपनापन
धूप सी खिल उठी है हर ओर ।

आज मैंने
इस तरह
महसूस किया है तुमको ।

मौलिक एवं अप्रकाशित
अरविन्द भटनागर 'शेखर'

Views: 951

Comment

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Comment by ARVIND BHATNAGAR on October 8, 2013 at 9:47am

आदरणीया गीतिका जी , बहुत बहुत आभार । 

Comment by वेदिका on October 7, 2013 at 1:42am

आ0 राजेश मृदु जी की ही बात दोहराउंगी, अद्भुत है तान्या श्रंखला|

बधाई !! 

Comment by ARVIND BHATNAGAR on October 4, 2013 at 9:14pm

आदरणीय सौरभ जी , अन्नपूर्णा  जी , संजय जी एवं गीत जी आप सभी के स्नेह और उत्साह वर्धन के लिए तहे दिल से आभार । 
'शेखर'

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 4, 2013 at 11:53am

बहुत सुंदर भावनात्मक रचना, बधाई स्वीकारें आदरणीय अरविन्द जी

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on October 4, 2013 at 9:02am

बहुत सुंदरता से गूँथे हुये भाव अंत तक आते आते मानो सम्मोहित कर लेते है....

सुंदर रचना हेतु सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय अरविंद शेखर जी....

Comment by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 10:44pm

आदरणीय अरविंद भटनागर जी बहुत सुंदर भाव , सुदर संयोजन  बधाई आपको । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2013 at 9:02pm

आदरणीय अरविन्द भटनागर ’शेखर’ जी,

आपकी प्रस्तुत रचना हाल की मेरी पढ़ी कई-कई सशक्त वैचारिक रचनाओं पर भारी पड़ती है. हर शब्द संतुलित और शब्द-विन्यास अत्यंत संयत ! प्रयुक्त इंगित सार्थक ! उनके प्रभाव सटीक !
आपकी अन्य रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी.


हार्दिक बधाइयाँ.

Comment by ARVIND BHATNAGAR on October 3, 2013 at 8:48pm

आप सभी के स्नेह और उत्साह वर्धन के लिए तहे दिल से आभार ।
'शेखर'

Comment by बृजेश नीरज on October 3, 2013 at 7:21pm

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति! आपको हार्दिक बधाई!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 3, 2013 at 6:59pm

किसी पहचानी सी लुप्त सूक्ष्म ऊर्जा को महसूस करना हो तो उसकी आवृति को जीते कई स्थूल अवयव उसे प्रतिबिंबित करते हैं.. एक संवेदनशील मनस उनके प्रति ग्राही होता है...

ऐसी ही संवेदनशीलता हो सुन्दरता से प्रस्तुत करती सफल मर्मस्पर्शी आत्मीय अब्भिव्यक्ति के लिए ह्रदय तल से बधाई आ० अरविन्द भटनागर जी 

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