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ग़ज़ल : मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ

वज्न : २१२२, २१२२, २१२

दूरियों का ही समय निश्चित हुआ,
कब भला शक से दिलों का हित हुआ,

भोज छप्पन हैं किसी के वास्ते,
और कोई शस्य से वंचित हुआ,
              (शस्य = अन्न)
क्या भरोसा देश के कानून पर,
है बुरा जो वो भला साबित हुआ,

नारियों सँग हादसे यूँ देखकर,
मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ,

सभ्यता की देख उड़ती धज्जियाँ,
मन ह्रदय मेरा बहुत कुंठित हुआ..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Vindu Babu on September 16, 2013 at 11:40pm
अरे! सारे कमेन्ट्स पढ़े बिना ही मैंने टिप्पणी कर दी। क्या हुआ जो आदरणीय सौरभ सर इतना नाराज हुए मैं समझ नहीं पाई,और आपने इतनी जल्दी मंच छोड़ने का निर्णय ले लिया,कैसे?
आदरणीय सौरभ सर की टिप्पणी तो हमेशा सुधारोन्मुख करती हुई होती ही है,और आपने स्वीकार भी किया है,तो फिर...
आहत करने वाली तो कोई बात नहीं दिखी जो बात यहां तक आ पहुंची।
मंच ज्वाइन करने लिए' स्वीकृति' ली थी न आपने,तो छोड़ ऐसे कैसे देंगे भाई?
आप दोनो से सादर निवेदन है कि आपस में बात करके सुलझालें,यदि कोई फितूर उत्पन्न हो गया हो...कृपया।
सादर
सादर
Comment by annapurna bajpai on September 16, 2013 at 11:39pm

आदरणीय  अरुण जी यों तो मै इस मंच पर आपकी गजल पर टिप्पणी के रूप मे प्रतिक्रिया दे चुकी हूँ , लेकिन चर्चा नीचे जिस बात पर हो रही है उसके देखते हुए मै आपसे आग्रह करती हूँ कि इस मंच को केवल इसलिए छोड़ कर जाना ठीक नहीं होगा । कई बार ऐसा होता है कि हमारे द्वारा किया गया कार्य हर्षातिरेक मे कुछ गड़बड़ हो जाता है और किसी बड़े के द्वारा समझाने पर हम उस काम को सुधार लेते है काम को करना बंद नहीं करते , न ही पलायन करते है । सादर ,

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on September 16, 2013 at 11:19pm

वाह, बहुत खूब ग़ज़ल कही है अरुण भाई |

Comment by Savitri Rathore on September 16, 2013 at 11:06pm

नारियों सँग हादसे यूँ देखकर,
मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ,
सच में वर्तमान विसंगतियों को उकेरती सुन्दर रचना .........बधाई हो।

Comment by Vindu Babu on September 16, 2013 at 10:51pm
वाह आदरणीय अरुन जी बहुत अच्छे भावों को पिरोया है आपने,शिल्प के बारे मे ज्यादा कुछ मैं जानती नहीं।
रचना से आपके बढते दायित्व का दबाव भी झलक रहा है।
वास्तव में आज समाज की विसंगतियां हृदय पर बोझ सी बन गई हैं।
शुभ शुभ
सादर
Comment by Meena Pathak on September 16, 2013 at 10:33pm

नारियों सँग हादसे यूँ देखकर,
मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ,
.......... सुन्दर ग़ज़ल, बधाई आप को

प्रिय अरुण जी

आप कहीं नहीं जा रहें हैं इस मंच को छोड़ कर ... मुझे ग़ज़ल के बारे में कोई ज्ञान नही है पर आप की ग़ज़ल दिल तक पहुँची है .. कोई बात है तो आप आपसी बातचीत से समस्या का समाधान कर सकते हैं पर इस मंच को छोड़ना ठीक नही

सादर
मीना

Comment by ram shiromani pathak on September 16, 2013 at 10:22pm

आदरणीय भाई अरुण शर्मा  जी,आपसे मेरा यही निवेदन है जल्दबाजी में कोई  निर्णय न लें// आपका ऐसा निर्णय सुनकर मुझे बहुत दुःख हो रहा है ///कृपा कर एक बार विचार विमर्श तो कर लें/सादर  

Comment by वेदिका on September 16, 2013 at 10:07pm

आदरणीय अरुण जी!

किसी भरम के चलते आप जल्दी मे ऐसा कुछ भी निर्णय नही लें| बात आपको जो भी कचोट गयी हो, आप विमर्श करके निपटा लें, और यहीं मंच पर रहें| ये मेरा निवेदन है हम सभी सदस्यों की ओर से!    

Comment by बृजेश नीरज on September 16, 2013 at 6:39pm

अरुण भाई, मेरा भी आग्रह है कि आप अतिरेक में इस तरह का निर्णय न लें. मंच बहुत महत्वपूर्ण है. मेरे हिसाब से तो संवाद में कहीं कुछ अंतराल रह गया, कुछ भ्रम उत्पन्न हुआ है, जिसके आप शिकार हो गए. मंच की गरिमा का मान हम सब सदस्यों से है इसलिए इसे बनाये रखना हम सबका दायित्व है.

आपसे अनुरोध है की आप चर्चा कर लें, जो गलतफहमियां हैं उन्हें दूर कर लें. मंच पर बने रहे.

ऐसे छोटी छोटी बातों पर मंच नहीं छोड़ा जाता मित्र.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 16, 2013 at 6:23pm

प्रिय अरुन जी ये सच है की आप बेहद संवेदन शील हैं किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जो आप मंच से विदा लेने की बात कर रहे हैं
आपकी कश्ती जरा सी हवा से ही डगमगा गई तो तूफानों को कैसे झेलेंगे बस इतना ही आत्म विशवास ,इतना ही प्रेम इस मंच से ?
ऐसी उम्मीद कभी नहीं की हमने आपसे

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