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मैंने बस राख में हवा की है -अभिनव अरुण ||ग़ज़ल||

ग़ज़ल –

२१२२  १२१२  २२

तुझसे मिलने की इल्तिज़ा की है ,

माफ़ करना अगर खता  की है |

 

राज़ पूछो न मुस्कुराने का ,

चोट खायी तो ये दवा की है |

 

अब मुझे हिचकियाँ नहीं आतीं ,

मेरे हक़ में ये क्या दुआ की है |

 

फूल तो सौ मिले हैं गुलशन में ,

खुशबुओं की तलाश बाकी है |

 

तुम इसे शाइरी समझते हो ,

मैंने बस राख में हवा की है |

 

एक पत्थर ख़ुशी से पागल था ,

आईनों ने ये इत्तिला की है |

 

था मुझे टूटना बिखरना तो  ,

क्यों मुझे ज़िन्दगी अता की है |

* सर्वथा मौलिक अप्रकाशित .

                      - अभिनव अरुण 

                        [19092013]

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on September 24, 2013 at 1:15pm

आभार आदरणीय एडमिन जी !! ''जो बिखरा था ''बिखरना '' हो गया है ...ग़ज़ल का कुछ निखरना हो गया है !! साधुवाद

१११ .

Comment by Abhinav Arun on September 22, 2013 at 10:22am

आ. वंदना जी आभार आपकी प्रतिक्रिया मेरा उत्साह बढ़ायेगी ..शुक्रिया !

Comment by vandana on September 22, 2013 at 7:17am

अब मुझे हिचकियाँ नहीं आतीं ,

मेरे हक़ में ये क्या दुआ की है |

एक पत्थर ख़ुशी से पागल था ,

आईनों ने ये इत्तिला की है |

बहुत बढ़िया गजल आदरणीय अभिनव सर 

Comment by Abhinav Arun on September 22, 2013 at 7:13am

आदरणीय श्री वीनस जी ..क्या कहने आपका स्नेह ..खिल गयी ग़ज़ल मेरी .. सब आपके आलेखों से कुछ सीख रहा हूँ असर दिख रहा है ये संतोषप्रद है . अच्छा और नया कहने का यत्न  जारी है स्नेह भी जारी रहे यही कामना है ..आभार !!

Comment by Abhinav Arun on September 22, 2013 at 7:11am

आभार आदरणीया राजेश जी , आपकी सराहना से ग़ज़ल कृतार्थ हुई , ह्रदय से धन्यवाद !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 21, 2013 at 11:01pm

अभिनव जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई सभी अशआर काबिले तारीफ हैं तहे दिल से दाद देती हूँ
ये तो बहुत ही पसंद आये

तुम इसे शाइरी समझते हो ,

मैंने बस राख में हवा की है |

 

एक पत्थर ख़ुशी से पागल था ,

आईनों ने ये इत्तिला की है |

 

Comment by वीनस केसरी on September 21, 2013 at 10:47pm

राज़ पूछो न मुस्कुराने का ,

चोट खायी तो ये दवा की है |

फूल तो सौ मिले हैं गुलशन में ,

खुशबुओं की तलाश बाकी है |

 

तुम इसे शाइरी समझते हो ,

मैंने बस राख में हवा की है |

 

एक पत्थर ख़ुशी से पागल था ,

आईनों ने ये इत्तिला की है |

इन् अशआर ने तो लूट ही लिया भाई जी ...
बस् जिंदाबाद जिंदाबाद दोहराए जा रहा हूँ

Comment by Abhinav Arun on September 21, 2013 at 1:10pm

आ. नीरज जी बहुत शुक्रिया अश'आर पसंद करने के लिए

Comment by Neeraj Neer on September 21, 2013 at 11:38am

तुम इसे शाइरी समझते हो ,

मैंने बस राख में हवा की है 

वाह बहुत खूब .. आदरणीय 

Comment by Abhinav Arun on September 21, 2013 at 7:13am

शुक्रिया आ. विनीत जी ग़ज़ल अनुमोदित  हो कृतार्थ हुई !!

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