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दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके-

तब के दंगे और थे, अब के दंगे और |
हुड़दंगी सिरमौर तब, अब नेता सिरमौर |


अब नेता सिरमौर, गौर आ-जम कर करलें |
ये दंगे के दौर, वोट से थैली भर लें |


मरते हैं मर जाँय, कुचल कर बन्दे रब के |
दंगाई महफूज, मार के निचले-तबके ||

मौलिक / अप्रकाशित

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Comment by Neeraj Neer on September 21, 2013 at 3:59pm

बहुत  जबरदस्त कटाक्ष 

Comment by MAHIMA SHREE on September 20, 2013 at 8:47pm

जबरदस्त!!! आदरणीय बधाई स्वीकार करें

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 20, 2013 at 1:09pm

निःशब्द कर दिया आपने आदरणीय क्या कहने लाजवाब कुण्डलिया छंद दिल से बधाई स्वीकारें.

Comment by shalini rastogi on September 20, 2013 at 12:13pm

आदरणीय रविकर सर ,

 क्या जम के खिंचाई की है आपने आज़म की .. बहुत करार व्यंग्य .. पढ़ कर मज़ा आ गया|

साभार!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 19, 2013 at 7:49pm

अब नेता सिरमौर, गौर आ-जम कर करलें |

आय हाय हाय, जम कर क्लास ली है जनाब, बढ़िया, बहुत बहुत बधाई । 

Comment by Savitri Rathore on September 19, 2013 at 6:49pm

रविकर जी,वर्तमान परिस्थितियों पर सार्थक और सटीक रचना कर्म हेतु बधाई हो !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 19, 2013 at 6:47pm

वाह लाजवाब आदरणीय रविकर सर लाजवाब कुण्डलिया बधाई स्वीकार करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 19, 2013 at 2:49pm

आदरणीय रविकर जी , जितनी तारीफ करूँ उतनी कम है !! लाजवाब कुन्डलिया !!  ढ़ेरों बधाई !!

Comment by Abhinav Arun on September 19, 2013 at 2:05pm

कमाल है रवि कर जी... सामयिक सटीक सशक्त ...बधाई !!

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