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नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज-रविकर

कुण्डलियाँ-


नारी अब अबला नहीं, कहने लगा समाज ।
है घातक हथियार से, नारि सुशोभित आज ।


नारि सुशोभित आज, सुरक्षा करना जाने ।
रविकर पुरुष समाज, नहीं जाए उकसाने ।


लेकिन अब भी नारि, पड़े अबला पर भारी |
इक ढाती है जुल्म, तड़पती दूजी नारी ।|


मौलिक / अप्रकाशित

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 24, 2013 at 5:09pm

आदरणीय रविकर जी , सुन्दर प्रस्तुति !! ढेरों बधाई !!

Comment by बसंत नेमा on September 24, 2013 at 4:32pm

आ0 रविकर जी बहुत सुन्दर भाव बह्त सुन्दर प्रस्तुति ....बधाई

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