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सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ -रविकर

कुण्डलियाँ


सियासती सुपनखा से, सिया-सती अनभिज्ञ |
अब क्या आशा राम से, हो रहे स्खलित विज्ञ |


हो रहे स्खलित विज्ञ, बने खरदूषण साले |
घालमेल का खेल, बुराई कुल अपना ले |


नित आगे की होड़, रखेंगे बढ़ा ताजिया |
सिया सती की लाज, बचा ले पकड़ हाँसिया ||

मौलिक / अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on October 1, 2013 at 2:56pm

बधाई आदरणीय .. वाह !

Comment by ram shiromani pathak on September 27, 2013 at 5:11pm

बहुत ही सुन्दर कुण्डलिया छंद आदरणीय //हार्दिक  बधाई आपको //सादर

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 27, 2013 at 12:27am

प्रिय रविकर जी ..फिर अपनी विधा की एक सुन्दर कुंडली पढ़ाया आप ने ..अच्छा विच्छेदन और व्यंग्य
भ्रमर ५

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 26, 2013 at 11:35pm

सुंदर कुंडली रचना, बधाई स्वीकारें आदरणीय रविकर जी

Comment by Abhinav Arun on September 26, 2013 at 5:27pm

भाव कथ्य शिल्प सभी चमत्कृत कर रहे हैं आ, रविकर जी बहुत बहुत नमन वंदन है आपकी रचना पर !!

Comment by annapurna bajpai on September 26, 2013 at 5:23pm

वाह !!! आदरणीय रविकर जी सुंदर रचना हेतु बधाई स्वीकारें । 

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 25, 2013 at 9:52pm

भावपक्ष एवं कला पक्ष के बेजोड् प्रस्तुति के लिये आदरणीय रविकरजी नमन सह बधाई

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 25, 2013 at 4:15pm

अद्वितीय रचना आदरणीय रविकर सर

सादर प्रणाम सहित बधाई

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 25, 2013 at 3:54pm

बेजोड़ कुण्डलिया छंद आदरणीय बहुत ही सुन्दर व्यंग कसा है आपने मजा आ गया बधाई स्वीकारें.

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 25, 2013 at 3:37pm

बेहतरीन सन्देश ! ह्रदय से बधाई 

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