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दो कुंडलियाँ - रविकर

(1)

हे अबलाबल भगवती, त्रसित नारि-संसार।
सृजन संग संहार बल, देकर कर उपकार।

 

देकर कर उपकार, निरंकुश दुष्ट हो रहे ।
करते अत्याचार, नोच लें श्वान बौरहे।

 

समझ भोग की वस्तु, लूट लें घर चौराहे ।
प्रभु दे मारक शक्ति, नारि क्यूँ सदा कराहे ॥

-----------------------------------------------

(2)

प्रणव नाद सा मुखर जी, पाता है सम्मान |
मौन मृत्यु सा बेवजह, ले पल्ले अपमान |

ले पल्ले अपमान , व्यर्थ मुट्ठियाँ भींचता |
बेमकसद यह क्रोध, स्वयं की कब्र सींचता |

नहिं *अधि ना आदेश, मात्र दिख रहा हादसा |
रविकर हृदय पुकार, आज से प्रणव नाद सा ||

*प्रधान

 

 

अप्रकाशित / मौलिक

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 2, 2013 at 11:25pm

अच्छी और सार्थ कुण्डलिया हुई हैं, आदरणीय.

सादर बधाइयाँ.

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 30, 2013 at 9:45pm

आपकी रचना हमारे लिये प्रेरणा स्रोत है । भाव की गंभिरता को शिल्प की उत्कृष्टता चमकृत कर रहा है । बधाई सह नमन

Comment by MAHIMA SHREE on September 30, 2013 at 9:07pm

आदरणीय रविकर सर ..दोनों कुंडलियाँ अलग -२ भाव होते हुए भी .. अपने आप में सम्पूर्ण है ... गजब तो आप लिखते ही ह है आपकी भावभूमि को नमन ..सादर

Comment by बृजेश नीरज on September 30, 2013 at 6:36pm

वाह! दोनों ही कुण्डलियाँ लाजवाब हैं! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 30, 2013 at 11:57am

बहुत सुन्दर आदरणीय रविकर सर जी

दोनों ही रचनाये अपने श्रेष्ट काव्य शौष्ठव को स्वतः ही दर्शा रहीं हैं

कथ्य और शिल्प दोनों ही उत्तम

Comment by रविकर on September 30, 2013 at 11:13am

आदरणीय / आदरणीया
बहुत बहुत आभार आप सभी का-

Comment by Ashish Srivastava on September 30, 2013 at 9:57am

raki kar ji bahu bahut badhai 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 29, 2013 at 9:12pm

आपकी कुंडलियों हमेशा मुझे चमत्कृत किया है ,आदरणीय  भाई रविकर जी बहुत मुबारक बाद !!

Comment by Meena Pathak on September 29, 2013 at 4:18pm

सुन्दर कुण्डलियाँ .. बधाई 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 29, 2013 at 2:34pm

एक नयी सोच और सार्थक प्रयास नारी हित में ! बधाई आपको 

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