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अपनी  निगाहों से मेरा हर अक्श मिटाने चला है वो

दिल से अपने अब मेरा हर नक्श मिटाने चला है वो

 

मेरी महफ़िल की रंगीनियत कम होने लगी शायद   

इसलिए साथ गैरों के महफिलें सजाने चला है वो

 

उस शख्स की शख्सियत भी क्या होगी यारो

मोहब्बत से भरा एक शख्स मिटाने चला है वो

 

जिसने खुद ही जलाई थी मोहब्बत की शमा कभी

उस शमा की आखिरी लौ भी अब बुझाने चला है वो

 

और जिनकी रग-रग मैं हैं धोखे और फरेब भरे

साथ उनके अब यारियों निभाने चला है वो

 

**************************************************

 

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 1015

Comment

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Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 1:04pm

भाई जीतेन्द्र जीत जी रचना आपने पसंद की इसके लिया आपका हार्दिक शुक्रिया ! 

Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 1:03pm

आपका तहे दिल से शुक्रिया कुंती मुखर्जी जी ....... 

Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 1:03pm

आदरणीया अन्नपूर्णा बाजपेई जी.... रचना आपको अच्छी लगी और आपने अपने बहुमूल्य विचार दिए उसके लिए हार्दिक आपका ! 

Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 1:01pm

सादर नमस्कार वीनस जी .... रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ... ! 

Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 12:58pm

महिमा जी आपका हार्दिक आभार ... रचना के प्रशंशा के लिए ! 

Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 12:57pm

आदरणीय गिरिराज जी ..... हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया आपका ! 

Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 12:56pm

भाई सुशील जोशी जी आपका हार्दिक आभार..... प्रोत्साहन के लिए !

Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 12:49pm

आपकी बधाई सर आँखों पर अनुराग जी ....रचना से आप जुड़े इसके लिए हार्दिक आभार आपका .... आपकी दुखती रग को आराम मिले यही कामना आपके लिए ...... ! 

Comment by Sachin Dev on October 5, 2013 at 12:47pm

आदरणीया मीना पाठक जी.... आपका हार्दिक आभार प्रोत्साहन के लिए ....!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 5, 2013 at 12:00pm

बहुत सुंदर रचना, बधाई आदरणीय सचिन जी

कृपया ध्यान दे...

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